ढिबरी
अन्हियारे से लड़ती अदना ढिबरी... सीने मे दावानल भी ... और सागर अगम अतल भी...
संस्मरण
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ब्लॉग डायरी
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बुधवार, 8 सितंबर 2010
जो हल निकाला तो सिफर निकले
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by padmsingh in गजल , गज़ल.गजल , पद्म , पद्मसिंह , पद्मावलि Tags: इलज़ाम , गज़ल , धडकन , पद्म , पद्म सिंह रचनाएँ , सिफर , हल [E...
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बुधवार, 1 सितंबर 2010
शह मिले या मात... देखी जायेगी
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साल… दिन…शामें…लम्हे… जाने कितने ठहरावों की फेहरिस्त है हमारे माज़ी की डायरी मे…..कभी फुर्सत के पलों मे अचानक कोई सफहा दफअतन उलट गया तो अपन...
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बुधवार, 25 अगस्त 2010
काव्य,वेलफेयर और बारिश की एक शाम …
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23 अग 2010 by padmsingh in कविता , कविता, हिन्दी , गज़ल.गजल , पद्म , पद्मसिंह , पद्मावलि [Edit] तीन चार दिन पूर्व मेरे क...
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भटकती आत्मा से साक्षात्कार (संस्मरण)
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11 अग 2010 10s by padmsingh in आलेख , पद्म , पद्मसिंह , पद्मावलि , संस्मरण , सरोकार [Edit] जाने क्यों और कैसे … बचपन...
हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है
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हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है जैसे कोई सपना थक कर टूटा लगता है महल चुने, दीवारें तानी चुन चुन जोड़ा दाना पानी लाखों रिश्तों में अपनी...
आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा –३)
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19 जुला 2010 by padmsingh in पद्मसिंह , पद्मावलि , सरोकार Tags: Azad police , आज़ाद पुलिस , गाज़ियाबाद , नंदग्राम , पुलिस , ब्रह्...
आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा-२)
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11 जुला 2010 गतांक से आगे – निर्दोष ब्रह्मपाल लखनऊ की आठ महीने पन्द्रह दिन की जेल काट कर आया तो उसका मन प्रशासन और पुलिस के भ्रष्टाचार...
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