ढिबरी
अन्हियारे से लड़ती अदना ढिबरी... सीने मे दावानल भी ... और सागर अगम अतल भी...
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सोमवार, 28 फ़रवरी 2011
संत्रास
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कब तक ये संत्रास रहेगा कब तक ये वातास बहेगा धूप न मिल पाई बिरवे को निर्मम कारा के गह्वर में प्यास न मिट पाई मरुथल की धूल धुंध फैली अन्तर में...
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छोटा सा बडप्पन
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जब भी उधर से गुजरता हूँ , नज़रें ढूंढती रह जाती हैं उसे लेकिन फिर कभी नहीं दिखा मुझे वहां पर प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश शहर का रेलवे स्टेशन.....
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पाती
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पाती के संग बहते आंसू पहुंचे तेरे पाँव में परदेसी परदेस छोड़ कर वापस आ जा गाँव में दिल में लावा उबल रहा है प्यासे रेगिस्तान है कुछ ब...
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पूजा के फूल
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पूजा के फूलों की ये ही परिणति है क्या चढ़ते है डाली से टूट ईश चरणों में मात्र अहम् पोषण को मर्दन को शोषण को अपनी ही जड़ से हो दूर चू...
प्रकाश पर्व ..
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मेरे द्वार पर जलते हुए दिए तू बरसों बरस जिए ... आंधियां सहना मगर द्वार पर ही रहना क्योकि यही है मेरी अभिलाषा मेरी आकांक्षा मेरी चाह क...
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बेटा!!… मेडल जुगाड़ से जीते जाते हैं ….समझे?
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चौथी क्लास की कोई दोपहर रही होगी … लेकिन जेहन में अभी भी उतनी उजली है… रघुनाथ मुंशी जी ने पूरे क्लास को संबोधित किया … गाना वाना आवत है कौन...
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आज़ाद पुलिस संघर्ष गाथा-४ (मुंबई में पुलिस का चालान काटेगी आज़ाद पुलिस)
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आशा है मेरी पिछली पोस्टों आज़ाद पुलिस संघर्ष गाथा-१ , आज़ाद पुलिस संघर्ष गाथा- २ और आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा –३) के माध्यम से आज़ाद पुलिस से आ...
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