शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

धीरे धीरे छूट रहा हूं

अन्दर अन्दर टूट रहा हूँ
धीरे-धीरे छूट रहा हूँ ।

सच्चा केवल अन्तर्मन है
बाहर बाहर झूठ रहा हूँ ।

रामबाण औषधि हूँ वैसे
यद्यपि कड़वा घूट रहा हूँ।

जीना कुछ आसान नहीं था
पत्थर कोपल फूट रहा हूँ।

 दोष किसे दूँ इस लुट जाने का,
मैं ही खुद को लूट रहा हूँ।

परत दर परत उतर रहा हूँ
जैसे  जैसे कूट रहा हूँ।


पद्म सिंह 07.09.2026

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