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रविवार, 5 दिसंबर 2010
बुधवार, 8 सितंबर 2010
जो हल निकाला तो सिफर निकले
by padmsingh in गजल, गज़ल.गजल, पद्म, पद्मसिंह, पद्मावलि Tags: इलज़ाम, गज़ल, धडकन, पद्म, पद्म सिंह रचनाएँ, सिफर, हल [Edit]
रात कब बीते कब सहर निकले
इसी सवाल में उमर निकले
तमाम उम्र धडकनों का हिसाब
जो हल निकाला तो सिफर निकले
बद्दुआ दुश्मनों को दूँ जब भी
रब करे सारी बेअसर निकले
हर किसी को रही अपनी ही तलाश
जहाँ गए जिधर जिधर निकले
हमीं काज़ी थे और गवाही भी
फिर भी इल्ज़ाम मेरे सर निकले
किसी कमज़र्फ की दौलत शोहरत
यूँ लगे चींटियों को पर निकले
उजले कपड़ों की जिल्द में अक्सर
अदब-ओ-तहजीब मुख्तसर निकले
….आपका पद्म ..06/09/2010
Posted via email from हरफनमौला
बुधवार, 1 सितंबर 2010
शह मिले या मात... देखी जायेगी
साल… दिन…शामें…लम्हे… जाने कितने ठहरावों की फेहरिस्त है हमारे माज़ी की डायरी मे…..कभी फुर्सत के पलों मे अचानक कोई सफहा दफअतन उलट गया तो अपनी जमा पूँजी मे से कुछ गिन्नियां तो कुछ कौडियाँ झाँकती दिखीं … जीवन के हर पल पर हम रुक कर अपनी मौजूदगी का खुद ही इतिहास बनाते रहने की कोशिश करते रहे … जाने कितने पड़ावों की खट्टी मीठी यादों को अपने एहसासों के गिर्द लपेटे दिन ब दिन भारी होते रहे …. हम अपने बीते पलों को अपनी पोटली मे लटकाए घुमते रहे … न चाहते हुए भी … खुशफहम यादों ने भले साथ छोड़ दिया हो … हर अनचाहे पलों की किर्ची गाहे बगाहे अपनी मौजूदगी जरूर दर्ज करवा जाती है …. और ठीक उसी समय जब कभी नहीं चाहा कि वो यहाँ हो… जन्मदिन, वार्षिकी और जाने क्या क्या मनाते रहे और खुश होते रह… किस बात की खुशी मनाते हैं हर पल… इसी बात की न ? … कि जो आने वाला कल है उसका क्या भरोसा … कम से कम हमारा माज़ी तो हमारी थाती है … इसीलिए तो हर पल को ठहर कर गौर से देख लेना चाहते हैं… जी लेना चाहते हैं … सामने का रास्ता धुंध से पटा है … अभी हैं अभी नहीं रहेंगे …. इसी लिए तो साल दर साल… लम्हे दर लम्हे …इतिहास बनने के लिए पल पल समेटते रहे ….रुकते रहे… ठहरते रहे …. लेकिन जो ठहरा नहीं कभी….. वो समय ही तो था ….
चंद अशआर आपकी नज़र कर रहा हूँ …. जीस्त की सौगात देखी जायेगी (जीस्त =जिंदगी)
शह मिले या मात देखी जायेगी
धूप है तो धूप से लड़ बावरे
रह गई बरसात, देखी जायेगी
एक जुगनू को जला कर, बुझा कर
तीरगी की ज़ात देखी जायेगी (तीरगी=अँधेरा)
मोहोब्बत की थाह पाने के लिए
जेब की औकात देखी जायेगी
बात कहने भर से बनती नहीं बात
बात मे कुछ बात देखी जायेगी
………आपका पद्म ०९/०१/२०१०
Posted via email from हरफनमौला
बुधवार, 25 अगस्त 2010
काव्य,वेलफेयर और बारिश की एक शाम …
23 अग 2010
तीन चार दिन पूर्व मेरे कवि मित्र सुमित प्रताप सिंह जी का ई-मेल मिला कि चौसठवें स्वतन्त्रता दिवस के उपलक्ष्य मे शोभना वेलफेयर सोसाइटी के तत्वाधान एक कवि सम्मलेन का आयोजन किया गया है जिसमे मुझे आमंत्रित किया गया है…नदीम जी से पूर्व कुछ अन्य उदीयमान रचनाकार अपना काव्यपाठ कर चुके थे जिन्हें न सुन पाने का खेद है जिनके नाम इस प्रकार हैं
१ – अनुराग अगम २ -जयदेव जोनवाल
देखता हूँ कैसा कैसा ख्वाब मे
तेरी खुशबू तेरा जलवा ख्वाब मे
तेरी आँखें तेरा चेहरा तेरे लब
ख्वाब ने भी ख्वाब देखा ख्वाब मे
……………………………………….
कंकड़ समेट कर कभी पत्थर समेट कर
हमने मकाँ बनाया है गौहर समेट कर
नाकामियों ने जब हमें जीने नहीं दिया
हमने भी रख दिया है मुकद्दर समेट कर
टुकड़ों मे बाँट देता हूँ तस्वीर आपकी
फिर उनको चूम लेता हूँ अक्सर समेट कर
——————————————-
गुलों को गुलची सितारों को खा गया सूरज
खैर साये की मियाँ सर पे आ गया सूरज
तमाम दुनिया की हस्ती पे छा गया सूरज
और औकात भी सब की दिखा गया सूरज
जैसे अहबाब के सीने से लिपटता है कोई
अब्र के सीने मे ऐसे समा गया सूरज
अब तो आ जाओ कि मै इंतज़ार करता हूँ
अब न शर्माओ कि कब का गया गया सूरज
गुरूर इसका भी ‘काविश’ खुदा ने तोड़ दिया
आओ कोहरे से वो देखो दबा दबा सूरज
इसके बाद नवोदित कवि श्री जितेन्द्र प्रीतम जी ने अपनी शिल्प और भाव से परिपक्व रचनाओं से बहुत प्रभावित किया -
पूरी हिम्मत के साथ बोलेंगे जो सही है वो बात बोलेंगे
आखिर हम भी कलम के बेटे हैं दिन को हम कैसे रात बोलेंगे
***
दिल को छूने वाले सारे ही सामान चले आयेंगे
शब्दों के ये भोले भाले कुछ मेहमान चले आयेंगे
मंच मिले न मिले मुझे इसकी परवाह नहीं है कोई.
मेरे गीत तुम्हारे दर तक कानो कान चले आयेंगे
चांदी की दीवार न तोड़ी प्यार भरा दिल तोड़ दिया
अब इन टुकड़ों को भी लेजा इन्हें यहाँ क्यों छोड़ दिया
कवि प्रतुल वशिष्ठ जी
के पाकिस्तान और भारत के रिश्तों पर व्यंग्यात्मक अपडेट रचना प्रस्तुत करने के बाद शोभना वेलफेयर सोसाइटी के कोषाध्यक्ष और युवा कवि सुमित प्रताप सिंह जी ने अपने छंद रुपी तड़कों से खूब रंग जमाया
जूते खाने से बचे दुनिया के सिरमौर
अगला जूता कब पड़े बुश फरमाते गौर
बुश फरमाते गौर बात अब बहुत बढ़ गयी
सारी दुनिया हाथ धोय के पीछे पड़ गए
विश्व सँवारे पूरा जो जिनके बूते
उस देश के मुखिया के किस्मत हाय जूते
ये खूने तमन्ना मुझसे अब देखा नहीं जाता
आ जिंदगी तुझे कातिल के हवाले कर दूँ
इसके बाद मान्यवर श्री रमेशबाबू शर्मा ‘व्यस्त’ जी ने अपनी प्रेरक रचनाओं की संजीदगी से श्रोताओं को मुग्ध किया
पंजाब हिमाचल तथा आसाम यहाँ है केरल तमिलनाडु राजस्थान यहाँ है
कोई भी प्रांत दर्द मेरा बांटता नहीं मै पूंछता हूँ मेरा हिन्दुस्तान कहाँ है
****
काग के कोसे पशु मरते नहीं
ईर्ष्या से मधुर फल झरते नहीं
व्यर्थ मत फूंको कुढन मे जिंदगी ऐ सत्पुरुष
सत्पुरुष पर-नींद को हरते नहीं
काव्य सभा के मुख्य अतिथि श्री जगदीश चन्द्र शर्मा जी (अध्यक्ष हिंदी साहित्य कला प्रतिष्ठान दिल्ली) ने रचना से पूर्व अपने अमूल्य वचनों से नवोदित रचनाकारों का पथ प्रदर्शन करते हुए कहा कि रचना करते समय व्यंजनाओं का आलम्ब लेना आवश्यक है परन्तु इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी पर व्यक्तिगत कटाक्ष से बचना चाहिए, जैसे आज के मीडिया चैनल खबर देने की जगह खबर लेने मे लगे हुए हैं … जबकि खबर जनता को लेना चाहिए ….. महाकवि कालिदास के नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम का उद्धरण देते हुए बताया कि किस तरह रचनाकारों को किसी पर तंज किये बिना अपनी बात कहने का प्रयास करना चाहिए… अर्थात धनात्मक और सृजनात्मक दिशा मे रचनाएँ की जाएँ तो उत्तम है… यद्यपि प्रत्येक रचनाकार अपनी रचनाओं के लिए स्वतंत्र है.
मान्यवर श्री जगदीश चन्द्र शर्मा जी ने अपनी सहज लेकिन अंतस को पोसती हुई एक रचना प्रस्तुत की—-
मैंने अपने मित्र से कहा तुम इस जलते दीप को लेकर कहाँ जा रहे हो तुम्हारा घर तो प्रकाश से भरा है….. मेरे अँधेरे घर को इसका प्रकाश चाहिए…… इसे मुझे दे दो … किन्तु अज्ञान के आवरण मे लिपटे मित्र ने कहा….. मै अपने अंतस के अन्धकार को मिटाने के लिए मै इसे गंगा माँ को अर्पित करना चाहता हूँ ……और उसने अपना दीप गंगा की लहरों मे प्रवाहित कर दिया….. देखते देखते एक नहीं दो नहीं असंख्य दीप निष्प्रयोजन ही गंगा की लहरों मे समाहित हो गए और मेरी कुटिया मे अँधेरा है
अंत मे काव्य सभा के अध्यक्ष श्री दीपकशर्मा जी (वरिष्ठ कवि एवं गीतकार) ने सभी कवियों को धन्यवाद देते हुए अपने अशआरो से श्रोताओं को मुग्ध किया—
न हिंदू न सिख ईसाई न मुसलमान हू
कोई मज़हब नहीं मेरा फकत इंसान हूँ
मुझको मत बांटिये कौमों ज़बानों मे
मै सिर से पाँव तलाक हिन्दोस्तान हूँ
यहाँ यह भी उल्लेख करना चाहूँगा कि शोभना वेलफेयर सोसाइटी निर्धन बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए कार्य करती है… सोसाइटी का कुछ विवरण निम्न प्रकार है -
कार्यालय- २४४/10 त्रिपथ स्कूल ब्लाक मंडावली, दिल्ली
फोन- 011-22474775
श्री अयोध्या प्रसाद वशिष्ठ – संरक्षक
सुश्री शोभना तोमर – अध्यक्ष
श्री सुमित प्रताप सिंह- कोषाध्यक्ष
श्री रंजीत सिंह – संयोजक
Posted via email from हरफनमौला
भटकती आत्मा से साक्षात्कार (संस्मरण)
कुछ बड़ा होने पर मैंने जाने किस अन्तःप्रज्ञा अथवा सहज बुद्धि के कारण डर से जीतने का मन बना लिया…. मुझे अच्छी तरह याद है कि जब भी मुझे कुंए या ऊंचाई से गिरने जैसे सपने आते… मैंने उसे ध्यान से देखना और स्वीकार करना प्रारम्भ किया… अर्द्धचेतन अवस्था में मैंने अपने आपको कई बार गहरे कुँए में गिर जाने दिया और डरते हुए भी साहस कर के गिरते हुए देखता रहा… किसी साए के दिखने पर भी मैंने उसके प्रति हिम्मत से काम लेते हुए देखता रहता… लेकिन इसकी तैयारियां जागने के दौरान ही करता…कई बार तो प्रतीक्षा भी करता इस तरह के सपने आने की .. अपनी छत की तीन इंच चौड़ी मुंडेर पर कांपते पैरों से लेकिन सप्रयास चलने की कोशिश करता… जानबूझ कर छत से नीचे देखता रहता… या मन ही मन ऐसी परिस्थितियों से लड़ने की कोशिश करता … धीरे धीरे मुझमे हिम्मत आती गयी और इस तरह के सभी सपने आने पूरी तरह से बंद हो गए… अब तो मुझे यदा कदा ही सपने आते हैं.. आज किसी भी अँधेरे, भूत या ऊंचाई आदि के डर से एकदम मुक्त हूँ…. किसी भी अँधेरी सुनसान या भुतहा जगह पर आधी रात चले जाना मेरे लिए मामूली बात है… कई बार तो शर्त लगा कई किलोमीटर दूर भयानक पुरानी खंडहर मंदिरों में रात बारह एक बजे बेहिचक हो कर आया हूँ… पर अब मुझे इन सब से डर नहीं लगता कभी … यद्यपि सतर्कता और सावधानी के प्रति लापरवाह भी नहीं हूँ …. इस तरह के सपनों का कारण कहीं न कहीं असुरक्षा की भावना से सम्बंधित होती है … बच्चों के कोमल मन मे कब कैसी चीज़ें घर कर जाती हैं, माता पिता या परिवार जान भी नहीं पाता.. और न बच्चा उसे अभिव्यक्त कर पाता है … और अकेले घुटता है… बचपन की ये भावनाएं और अनुभव पूरे जीवन उसके साथ चलते हैं और कहीं न कहीं उसके व्यवहार और सोच को प्रभावित करते हैं…
मै घर लौट आया …. पत्नी बच्चे घटना से अनभिज्ञ सो रहे थे … मुझे भी सोचते हुए कब नींद आ गयी पता नहीं… सुबह देर से उठा तो कालोनी और उस से बाहर तक चर्चा फ़ैल गयी थी …. रात मोहल्ले मे चुड़ैल घूम रही थी… किसी ने कहा मेरा दरवाजा खटखटाया… किसी ने कहा मेरे घर प्याज रोटी मांग रही थी … जितने मुँह उतनी तरह की बातें …. पर मुझे अब भी ग्लानि होती है कि किसी की बेटी इस तरह से बेसहारा घूम रही थी… मै प्रयास करता तो शायद उसके घर तक पहुंचा सकता था ….
Posted via email from हरफनमौला
हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है
हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है
जैसे कोई सपना थक कर टूटा लगता है
महल चुने, दीवारें तानी चुन चुन जोड़ा दाना पानी
लाखों रिश्तों में अपनी सूरत ही लगती है अनजानी
कर्तव्यों की कारा में मन का पंछी बिन पंख हो गया
अनजाने अनचाहे पथ पर चलते जाना भी बेमानी
मन उपवन का नकली हर गुल बूटा लगता है
हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है
सोने की दीवारें भी बंदी की पीर न हर पाती हैं
यादों की दस्तक पर, अनजाने आँखें भर आती है
पीछे मुड़ कर देखो तो कल अभी अभी सा लगता है
आगे जीवन के दीपक की बाती चुकती जाती है
आईने का मंजर लूटा लूटा लगता है
हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है
जीने का पाथेय चुकाना होता है हर धड़कन को
साँसे देकर पल पल पाना होता है जीवन धन को
जीना भी व्यापार हुआ पाना है तो देना भी है
जैसे तैसे समझाना पड़ जाता है पागल मन को
ऊपर वाले का भी खेल अनूठा लगता है
हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है
01 अग 2010
आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा –३)
19 जुला 2010
by padmsingh in पद्मसिंह, पद्मावलि, सरोकार Tags: Azad police, आज़ाद पुलिस, गाज़ियाबाद, नंदग्राम, पुलिस, ब्रह्मपाल [Edit]
ब्लॉगिंग केवल आभासी नहीं रह गयी है, इस बात का अनुभव मुझे उसी दिन से हो गया था जिस दिन मैंने अपनी पोस्ट “आज़ाद पुलिस” लिखा… पोस्ट नीरस थी और किसी के व्यक्तिगत
जीवन को प्रभावित नहीं करती थी इस लिए प्रतिक्रियाएँ भले ही कम मिलीं हों .. लेकिन जो भी प्रतिक्रियाएँ मिलीं वो मेरी पोस्ट और लेखन को सार्थक करने के लिए पर्याप्त थी. पोस्ट पढ़ कर यूँ तो कई लोगों की प्रतिक्रियाएँ आईं लेकिन इस सम्बन्ध में श्री जय कुमार झा जी की मेल मुझे लगातार आती रही…उन्होंने बार बार ब्रह्मपाल जी से मिलने की उत्कट इच्छा व्यक्त की … कई बार मोबाइल पर बात चीत होने के बाद दिनांक18/07/2010 को ब्रह्मपाल जी से मुलाकात करने की बात तय हो गयी …झा जी नरेला से आ रहे थे .. तय समय पर मैंने उन्हें आनंद विहार बस अड्डे से लिया और ब्रह्मपाल से मिलने निकल पड़े… यहाँ मै यह उल्लेख भी करना चाहता हूँ कि श्री जय कुमार झा जी hprd से जुड़े हुए हैं और ईमानदारी और मानवता के प्रति कृतसंकल्प हैं … दिल्ली ब्लॉगर मीट में जो लोग रहे होंगे वो मिल चुके होंगे … गर्मी इतनी भीषण, कि दोनों ही पसीने से पूरे के पूरे भीग चुके थे… और आधे घंटे में हम ब्रह्मपाल जी(आज़ाद पुलिस) के पास थे ..
ब्रह्मपाल जी हमसे मिल कर बहुत खुश लग रहे थे और बोलते हुए भावुक हो उठे कि पन्द्रह वर्षों में पहली बार आपकी तरह कोई बैठ कर मेरी बातें सुनने आया है मेरे पास … बीच में कई लोग जुड़े भी लेकिन खोखले आश्वासन के अलावा आजतक कुछ नहीं मिला कभी … अब मुझे कुछ मिले न मिले लेकिन इतना तो संतोष है कि मेरी बात किसी के कानों तक पहुंची तो सही ….अभी तो बहुत कुछ और बताने और दिखाने को था आज़ाद पुलिस के पास …हजारों पत्रों की प्रति और रिक्शा चला कर कमाए हुए पैसे से सैकड़ों रजिस्ट्रियों की रसीद देख कर कोई इस इंसान को जुनूनी ही कहेगा… चिट्ठियों और पेपर कटिंग्स से भरी दूसरी गठरी खोलने से पहले ही हमने उन्हें मना कर दिया और आगे भी मिलते जुलते रहने का आश्वासन दिया …
इतनी भीषण गर्मी के बावजूद ब्रह्मपाल के पास एक अदद टेबल फैन तक नहीं था … अन्य किसी सुविधा की क्या बात करना … जमीन पर सोना, अपने दो बेटों और पत्नी के साथ …. एक अदद रिक्शा ही जीविका और संघर्ष दोनों के लिए आर्थिक श्रोत है … अन्य कहीं से कोई सहायता नहीं मिली कभी … हाँ अगर कुछ है ब्रह्मपाल जी के पास तो वो है भ्रष्टाचार और शासन की लापरवाही के विरूद्ध लोहा लेने की उत्कट इच्छा शक्ति और परमार्थ कुछ कर गुजरने का जूनून …
किसी भी तरह के सहयोग के सम्बन्ध में इस पर मेल करना न भूलें …
azadpolice@gmail.com
Posted via email from हरफनमौला
आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा-२)
11 जुला 2010
गतांक से आगे –निर्दोष ब्रह्मपाल लखनऊ की आठ महीने पन्द्रह दिन की जेल काट कर आया तो उसका मन प्रशासन और पुलिस के भ्रष्टाचार के प्रति विरक्ति से भर गया था… जेल मे रह कर उसने जो कुछ भी देखा सुना उसने उसे पुलिस के प्रति मानसिक रूप से विद्रोही बना दिया… लेकिन एक गरीब कर भी क्या सकता था … बूढ़ी माँ की जिद पर उसने ब्रह्मवती से विवाह कर लिया. और आजीविका के लिए मजदूरी करने लगा… मजदूरी कर के कुछ पैसे जुटाए और अपने लिए एक रिक्शा ले लिया और परिवार सहित हापुड कोतवाली मे डेरा डाल दिया … वहाँ भी इसने अपने साथ हुए अत्याचार के लिए न्याय मांगने के लिए जद्दोज़हद करता रहा… लेकिन उसे कभी दुत्कार तो कभी पुलिस हवालात तो कभी लात घूंसे भी खाने पड़े … न्याय पाने के लिए उसने जिलाधिकारी,पुलिस अधीक्षक से लेकर मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक के सामने अपनी बात रखी लेकिन न् तो मामले की जाँच हुई और न् ही कोई कार्यवाही हुई… दूसरी क्लास तक पढाई करने के बावजूद ब्रह्मपाल मे लेखन की प्रतिभा और समाज के प्रति समर्पण की भावना कूट कूट कर भरी होने के कारण उसने पुलिस की कार्य प्रणाली के सम्बन्ध मे अधिकारियों को हजारों पत्र लिखे…लेकिन कोई हल नहीं निकला … आज वो अपने साथ हुए अन्याय की उम्मीद छोड़ चुका है… आज उसकी एक ही मांग है कि प्रशासन को लिखे गए उसके सारे पत्र वापस कर दिए जाएँ …
लचर पुलिस व्यवस्था के विरूद्ध संघर्ष -
अपने साथ हुए अत्याचार का कोई न्याय मिलते न देख ब्रह्मपाल ने पुलिस प्रशासन के प्रति विरोध का अनूठा तरीका अपना लिया … रिक्शा ही उसकी आजीविका का एक मात्र साधन था… उसने एक दिन खुद ही पुलिस की वर्दी पहन ली … और रिक्शे पर आज़ाद पुलिस के बोर्ड लगा लिए… अपने आपको आज़ाद पुलिस के रूप मे इस लिए बदल लिया कि इस पुलिस के पास नेताओं या अधिकारियों का कोई दबाव नहीं है ..आज़ाद पुलिस भ्रष्टाचार के प्रति बिना किसी लाग लपेट के लड़ाई जारी रखेगी … उसने रिक्शा चलाते हुए भी पुलिस का वेश धारण कर लिया और अपने कमाए पैसों से चालान बुक छपवा ली …
अब उसका मिशन है कि रिक्शा चलाते हुए जहाँ भी पुलिस के लोगों को अपनी ड्यूटी से दूर खड़े होते, नशे मे ड्यूटी करते, रिश्वत लेते,या बिना टोपी डंडे के ड्यूटी देते देखता है तुरंत रुक कर पुलिस वाले का चालान काट देता है … और चालान पर नाम सहित कमियों के उल्लेख करने के साथ साथ उस पुलिस वाले से चालान पर हस्ताक्षर भी ले लेता है … हस्ताक्षर न देने पर बवाल खड़ा कर देता है…
जिससे फजीहत के डर से पुलिस वाला हस्ताक्षर कर अपना पिंड छुड़ाता है … और ये चालान एक दो दिन मे एस एस पी आफिस मे बाकायदा कार्यवाही की प्रार्थना के साथ जमा करवा दिया जाता है … ऐसे मे भले पुलिस वाले पर कोई गंभीर कार्यवाही भले न हो लेकिन उसकी फजीहत होना तय है … और इसी लिए पुलिस वाले भी उसको देखते ही “राईट-टाइट” हो जाते हैं … जिस पुलिस वाले ने हेलमेट न पहना हो, जिसकी गाड़ी के प्रपत्र पूरे न होँ, या तिहरी सवारी कर रहे होँ उनका चालान कटना तय है …
———————————
उसका मिशन है कि जिस भ्रष्टाचार और अत्याचार का वो शिकार हुआ है…उसका शिकार कोई और गरीब न हो इसके लिए उसका यथा-शक्ति संघर्ष लगातार चलता रहता है …
——————————–जहाँ भी उसे लगता है कि व्यवस्था मे कुछ गलत हो रहा है उसके बारे मे प्रशासन को सचेत करने के लिए चिट्ठियाँ लिखना … सरकार की नीतियों के खिलाफ विकास के झूठे साइन बोर्डों पर कालिख पोतना, और अपने तरीके से विरोध दर्ज करवाना उसका रोज़ का काम है … इस सब के कारण अक्सर हवालात की हवा खाता रहता है …. कई बार तो बुरी तरह पीटा भी जाता है…इसी क्रम मे कुछ दिन पहले गाज़ियाबाद कलेक्ट्रेट मे मुख्यमंत्री के विकास सम्बन्धी दावों वाले पोस्टरों पर कालिख पोतने के जुर्म मे कविनगर पुलिस द्वारा अपराध संख्या 371/2010 के अंतर्गत जेल मे निरुद्ध किया गया और उसका रिक्शा भी थाने मे बंद कर दिया गया था जहाँ से अभी कुछ दिन पहले छूट कर आया है….
काफी मशक्कत के बाद रिक्शा भी छूट गया है… और पूर्व की भांति उसका संघर्ष अनवरत चल रहा है … यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ब्रह्मपाल मे न्याय न् मिलने से निराशा अवश्य है लेकिन उसका जूनून आज भी वही है … फर्क सिर्फ इतना है कि पहले उसकी लड़ाई अपने लिए थी और आज वो गरीब जनता के लिए संघर्ष कर रहा है ….
तिरंगा का अपमान -
पिछले काफी समय से “तिरंगा” ब्राण्ड के एक गुटखा कंपनी के विरुद्ध संघर्ष कर रहा है… इसके अनुसार किसी ऐसी चीज़ का नाम तिरंगा होना… या इस पर तिरंगा छापना राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का अपमान है… इस सम्बन्ध मे नगर मजिस्ट्रेट गाज़ियाबाद द्वारा उसके प्रार्थना पत्र के आधार पर पुलिस अधीक्षक गाज़ियाबाद को उक्त के सन्दर्भ मे गुटखा कंपनी के विरुद्ध नियमानुसार कार्यवाही करने के निर्देश दिए गए हैं (कैम्प/एस टी -सी एम/०९ दिनांक २९-०९-२००९) लेकिन न् तो अभी इसकी जाँच पूरी हुई है और न् ही गुटखा कंपनी के विरूद्ध कोई कार्यवाही की गयी है.
और कारवाँ बनता गया –
शुरुआत मे जब ब्रह्मपाल इस तरह के विरोध के कार्य करता तो पुलिस के लोग और अधिकारी उसे सरफिरा कह कर या “मानसिक संतुलन ठीक नहीं है” कह कर टाल देते थे… लेकिन धीरे धीरे लोगों और पत्रकारों की उत्सुकता का केन्द्र बनता गया और ब्रह्मपाल के बारे मे ख़बरें छपने लगीं … इससे उसे जानने वालों मे इजाफा हुआ और कुछ समाज सेवी लोग ब्रह्मपाल से मिले और इसके अभियान मे साथ देने की इच्छा प्रकट की …इस तरह ब्रह्मपाल ने स्थानीय लोगों की मदद से “आज़ाद पुलिस वेलफेयर समिति” का गठन किया गया जिसका संस्थापक ब्रह्मपाल को और अध्यक्ष श्री बी.एस.गौतम को बनाया गया …
आज़ाद पुलिस वेलफेयर समिति -
आज़ाद पुलिस वेलफेयर समिति बन जाने से ब्रह्मपाल को लोगों का समर्थन और अधिक मिलने लगा …उक्त समिति के तत्वाधान मे बहुत से सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किये गए और किये जाते हैं …इस समिति के माध्यम से दो अनाथ और गरीब लड़कियों का विवाह करवाया गया … प्रति वर्ष सावन माह मे कांवड के मेले मे इस समिति के माध्यम से कांवडियों के लिए मुफ्त भंडारे का आयोजन किया जाता है …वृक्षारोपण के कार्य करवाए गए जिसका उदघाटन स्वयं सिटी मजिस्ट्रेट ने अपने हाथों से किया …..इसके अतिरिक्त पल्स पोलियो जैसे सरकारी
कार्यक्रमों को भी सफल बनाने के लिए रैलियाँ निकाली गयीं जिसके पीछे ब्रह्मपाल का जूनून और अथक संघर्ष रहा है … इसके अतिरिक्त गुजरात मे आये भूकम्प पीड़ितों के लिए अथक परिश्रम कर के चंदा इकठ्ठा किया गया और गुजरात भेजा गया…. इसके अतिरिक्त और भी बहुत से कार्य समय समय पर किये जाते रहते हैं… इस सम्बन्ध मे ब्रह्मपाल का कहना है कि जब लोग बुराई का दामन नहीं छोड़ते तो मै अच्छाई का दामन कैसे छोड़ दूँ … लोग कहते हैं क्रम ही पूजा है… लेकिन ब्रह्मपाल का कहना है कर्म तो बुरे भी हो सकते हैं इस लिए “सत्कर्म ही पूजा है” सब से पहले सत्कर्मों की शुरुआत अपने आप से करो … फिर किसी से इसकी अपेक्षा करो… समिति ने पुलिस की छवि सुधारने के लिए राज्य के 70 जिलों के जिलाधिकार्यों को पत्र लिखा है और आवश्यक सलाह दी है … देखना है कि प्रशासन इसे कितनी गंभीरता से लेती है ब्रह्मपाल को सामाजिक कार्यों के लिए कई बार आंबेडकर जन्मोत्सव समिति द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है … आज जब कि वह प्रशासन से नाराज़ है , उसने पिछले पन्द्रह सालों मे प्रशासन को लिखे गए अपने पत्रों को वापस माँगा है …
उल्लेखनीय है कि समाज के बारे मे ऐसी बातें करने वाले ब्रह्मपाल के पास सर छुपाने की भी जगह नहीं है और खुले आसमान के नीचे ही अपना आशियाना बना रखा है… परिवार के नाम पर ब्रह्मपाल की पत्नी और दो बेटे हैं … जिन्हें कभी किसी बरामदे मे तो कभी खुले आसमान के नीचे ले कर रहता है … दिन भर रिक्शा चलाना और इसी कमाई से समाज सेवा करना कितना कष्टसाध्य कार्य है इसे एसी मे बैठे अफसरशाह कैसे और क्यों समझेंगे … लोक सेवक हमारी प्रशासनिक व्यवस्था के आधार स्तंभ हैं … लेकिन भ्रष्टाचार के दलदल मे इस कदर डूबे हैं कि उन्हें स्वार्थ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखाई देता है … अगर कोई अपवाद आता भी है तो धीरे धीरे इसी भ्रष्टाचार रुपी सागर मे समा जाता है … अगर कोई बच भी गया तो स्थानांतरण आदेश की प्रति हमेशा उसका पीछा करती रहती है … ऐसे मे ब्रह्मपाल जैसा जज़्बा एक आम आदमी के लिए सीख से कम नहीं है… उसका कहना है कि कामयाबी अपनी जगह है और प्रयास करना अपनी जगह … जीते जी मेरा प्रयास चलता रहेगा … १९८८ से अकेला प्रशासन से लड़ जाने वाला यह शख्स प्रधानमन्त्री,लखनऊ सचिवालय,जिलाधिकारी, पुलिस अधिकारी से लेकर राष्ट्रपति तक अकेला संघर्ष कर चुका है .. और आज भी अपने जज्बे पर कायम है …
ब्रह्मपाल का वर्मान पता :ब्रह्मपाल सिंह
लेखक : आज़ाद पुलिस
बरात घर, खुले आसमान के नीचे
नन्द ग्राम गाज़ियाबाद … फोन :9811394513 (PP)
और अन्त मे …… ब्रह्मपाल के दस्तावेज़ और संघर्ष की कहानी की ये बानगी भर है … बहुत संक्षिप्त और मूल मूल बातें लिखते हुए दो पोस्टें भर गयी हैं …पाठकों के समर्थन पर थोड़ा और प्रकाश डालना चाहूँगा ब्रह्मप्रकाश की व्यथा पर … पद्म सिंह
Posted via email from हरफनमौला
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