शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी


क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी
संघर्षों का फल लाएगी

स्वप्न बंधे जंजीरों में
आशाएं कुंठित रुद्ध भले होँ
आज समय विपरीत सही
विधि के निर्माता क्रुद्ध भले होँ
स्वेद लिखेगा आने वाले
कल को बाज़ी किसकी होगी
झंझावात रुके हैं किससे
राहें होँ अवरुद्ध, भले होँ
जाग पड़ेंगे सुप्त भाग्य
कुछ ऐसा कोलाहल लाएगी
क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी
संघर्षो का फल लाएगी …

हमने सीखा नहीं समय से
डर जाना घुट कर मर जाना
क्रान्ति और संघर्ष रहा है
परिवर्तन का ताना बाना
दुर्दिन के खूनी पंजों से
खेंच सुपल फिर वापस लाना
ठान लिया तो ठान लिया
पाना है या कट कर मर जाना
थर्रायेंगे दिल दुश्मन के
वो भीषण हलचल लाएगी
क्रांति सुनहरा कल लाएगी
संघर्षों का फल लाएगी….

याचक बन कर जीना कैसा
घुट घुट आंसू पीना कैसा
रोशन होकर ही जीना है
धुवाँ धुवाँ कर जीना कैसा
घात लगा कर गलियों गलियों
गद्दारों की फ़ौज खड़ी है
तूफानों से घबरा जाए
वो भी कहो सफीना कैसा
हर पगडण्डी राजमार्ग तक
आज नहीं तो कल लाएगी
क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी
संघर्षों का फल लाएगी ….

(C) पद्म सिंह 

जीत पाया नहीं किन्तु हारा नहीं

तुम मेरे ना हुए ना मिले ना सही 
अब भी दिल पर मेरे हक हमारा नहीं
गाँव माज़ी  में कोई घरौंदा तो है
जिस को सपनों ने बेशक सँवारा नहीं 

गिर गयी रात की आख़िरी पाँखुरी
और उफ़क पर भी कोई सितारा नहीं 
आखरी साँस है मेरी आवाज़ की 
फिर न कहना के हमने पुकारा नहीं 

एक दिया टिमटिमाता रहा रात भर 
एक दस्तक की उम्मीद जागी रही  
एक कतरा  न टूटा मेरी आँख से 
एक लम्हा तेरे बिन गुज़ारा नहीं 

यूँ तो हर फ़ूल का एक अंजाम है
खिल के महका महक कर के खुद गिर गया 
तुम कली तोड़ कर घाव क्यों दे गए 
वक्त का तुमने समझा इशारा नहीं 

शर्त बस एक थी मैं तुम्हारा रहूँ
मेरा कुछ ना रहे सब तुम्हारा रहूँ 
ना मिरा मैं रहा ना तुम्हारा हुआ 
हाय डूबा के मिलता किनारा नहीं। 

ज़िन्दगी का फ़साना भला या बुरा 
सुर में सुर बिन मिलाए गुज़ारा नहीं 
दिल लुभाती हैं  लहरों की अठखेलियाँ
कूद जाओ तो मिलता किनारा नहीं 

ज़िन्दगी जंग है रंग ए महफ़िल भी है
वही मजधार है और साहिल भी है 
हौसलों के मुसलसल हुए इम्तहाँ
जीत पाया नहीं किन्तु हारा नहीं
(C) पद्म सिंह 28.02.2017

सुबह हो गयी कौवा बोला लल्ला ने कंप्यूटर खोला

सुबह हो गयी कौवा बोला 
लल्ला ने कंप्यूटर खोला

आँखें मींचे ऊपर नीचे 
फेसबुकी संदेश निहारे 
हाय हैलो की टेर लगाई
गुड मॉर्निंग के चस्पे मारे
मैसेज वाला बॉक्स टटोला 
सुबह हो गयी कौवा बोला

अनगढ़ सा इक शेर निकाला 
इधर उधर की फोटू डाला 
चाय लिखा, नमकीन दिखाई 
सुबह सुबह की सैर बताई 
अखबारों से ख़बर उड़ाई 
उसे बना स्टेटस ठेला 
सुबह हो गयी कौवा बोला

सुन्दर सुन्दर मुखड़े छांटे 
बड्डे बड्डे हैप्पी बाँटे
छाँट छाँट रिक्वेस्ट सहेजा 
बेस्ट फ्रेंड को मैसेज भेजा 
फिर मैडम को कुहनी मारी 
बेट्टी तो लाओ मुँह खोला 
सुबह हो गयी कौवा बोला

पाँच टिप्पणी पंद्रह लाइक
मन प्रसन्न स्टेटस टाइट 
क्रान्ति शान्ति समझा आए हैं 
सबको नीति बता आए हैं 
जितना ज्ञान बचा रक्खा था 
सबको बाँटा तोला तोला 
सुबह हो गयी कौवा बोला…

मैडम ने जब झिड़क लगाई 
तब धरती पर लौटे भाई 
ड्यूटी का टाइम हो आया 
आधा धोया जरा नहाया 
बस के पीछे पीछे भागे 
थामे हाथ टिफ़िन का झोला 
सुबह हो गयी कौवा बोला 
लल्ला ने कंप्यूटर खोला।

(निर्मल हास्य) …. पद्म सिंह

बुधवार, 15 जुलाई 2026

जीवन इक दरिया है, रेत समुन्दर की

प्यार नहीं है बैठ किनारे रह जाना
कूदे जो मजधार, धार में बह जाना ।

ज़ुल्म नहीं है मात्र जुल्म करते रहना
बड़ा जुल्म चुपचाप जुल्म को सह जाना ।

चुप रहने से  कोई  नहीं सुनने वाला
बात पड़े कहने की तो फिर कह जाना ।

इज्जत, शोहरत, उल्फत, ताकत, धन-दौलत
सब मीनारें ढहते ढहते ढह जाना। 

मुद्दत बाद मिले यारों से बचपन के 
रात ढल गई कहने लगे सुबह जाना । 

जीवन इक दरिया है, रेत समुन्दर की  
उम्र एक सैलाब सभी कुछ बह जाना ।
(C) पद्म प्रकाश सिंह 15.07.2026







रविवार, 5 जुलाई 2026

गज़ल तेरी आँखों के जादू टोने में

मुद्दत एक लगा दी मेरा होने में
उम्र कट गई बिखरी उम्र सँजोने मे ।  

रिश्तों की कीमत पहचान न पाए तो
क्या रखा है हीरे-चाँदी-सोने में ।

बात दब गई नक्कारों की महफिल में
इससे तो बेहतर था चुप ही होने में।

जो संस्कार झलकते हैं किरदारों में
कई पीढ़ियाँ लगीं सींचने बोने में।

साथ उमर के पथराते ही चले गए
वैसा मज़ा नहीं आता अब रोने में ।

इतने में जाकर बाज़ार उठा लाते
रिश्ते नाते जितना लगे पिरोने में।

एक पुरानी नज़्म पढ़ी तो खो बैठा
फिर उसकी आंखों के जादू टोने में ।

(C) पद्म प्रकाश सिंह -05-07-2026






गुरुवार, 2 जुलाई 2026

धूप

सवेरे ही शाम का मज़मून गढ़ जाती है धूप
एक सफ़हा ज़िन्दगी का रोज़ पढ़ जाती है धूप

लाँघती परती तपाती खेत, घर ,जंगल, शहर
धड़धड़ाती रेल सी आती है बढ़ जाती है धूप

मुंहलगी इतनी कि पल भर साथ रह कर देखिये
पाँव छू, उंगली पकड़ फिर सर पे चढ़ जाती है धूप

किस कदर चालाक है ख़ुर्शीद की बेटी भला
खिज़ां का इल्ज़ाम रुत के सर पे मढ़ जाती है धूप

देख सन्नाटा समंदर पे हुकूमत कर चले
शहर से गुजरी कि बित्ते में सिकुड़ जाती है धूप

पूस में दुल्हन सी शर्माती लजाती है मगर
जेठ में छेड़ो तो इत्ते में बिगड़ जाती है धूप

-पद्म

ख़ुर्शीद की बेटी= सूर्य की बेटी/धूप 

मेरा एकान्त

मेरा एकान्त अक्सर ताने मारता है
कि तुम क्या हो और दिखाते क्या हो… 
क्यों नहीं एक बार झटक देते सिर 
चुका क्यों नहीं देते उधार मान्यताओं का 
दहकती हुई कविता में आग निचोड़ो
नेपथ्य से निकल कर कह डालो अपने संवाद 
मुक्त करो किसी पत्थर में फंसी मूरत 
या तूलिका से गढ़ो कोई आकाश 
जिसमे पंछी सूरज से गलबहियाँ करते हों 
तुन जिस तरह उस लड़की से
विदा ले रहे थे 
मैं समझ गया था 
तुम चप्पू भले चलाओ
घाट से बंधन नहीं खोल सकोगे 
उड़ान कितनी ऊँची कर लो
चरखी से डोर नहीं खोल सकोगे 
उछालो न कोई नाद चौताला 
नोच फेंको मुखौटे  
वरना जब भी मिलोगे  कभी अकेले मे 
छोड़ूँगा नहीं 
और पता ये भी है
गोलचक्कर में भागोगे
तो कहाँ जाओगे 
जब भी खुद से लड़ोगे
मुँह की खाओगे
-पद्म सिंह 15-03-2017