बुधवार, 15 जुलाई 2026

जीवन इक दरिया है, रेत समुन्दर की

प्यार नहीं है बैठ किनारे रह जाना
कूदे जो मजधार, धार में बह जाना ।

ज़ुल्म नहीं है मात्र जुल्म करते रहना
बड़ा जुल्म चुपचाप जुल्म को सह जाना ।

चुप रहने से  कोई  नहीं सुनने वाला
बात पड़े कहने की तो फिर कह जाना ।

इज्जत, शोहरत, उल्फत, ताकत, धन-दौलत
सब मीनारें ढहते ढहते ढह जाना। 

मुद्दत बाद मिले यारों से बचपन के 
रात ढल गई कहने लगे सुबह जाना । 

जीवन इक दरिया है, रेत समुन्दर की  
उम्र एक सैलाब सभी कुछ बह जाना ।
(C) पद्म प्रकाश सिंह 15.07.2026







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