रविवार, 5 जुलाई 2026

गज़ल तेरी आँखों के जादू टोने में

मुद्दत एक लगा दी मेरा होने में 
किर्चें कईं चुभ गईं मन के कोने में ।

रिश्तों की कीमत पहचान न पाए तो
क्या रखा है हीरे चाँदी सोने में ।

बात दब गई नक्कारों की महफिल में 
इससे तो बेहतर था चुप ही होने में।

जो संस्कार झलकते हैं किरदारों में 
कई पीढ़ियाँ लगीं सींचने बोने में।

साथ उमर के पथराते ही चले गए 
वैसा मज़ा नहीं आता अब रोने में ।

इतने में जाकर बाज़ार उठा लाते 
रिश्ते नाते जितना लगे पिरोने में।

एक पुरानी नज़्म पढ़ी तो खो बैठा 
फिर उसकी आंखों के जादू टोने में ।

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