सोमवार, 28 फ़रवरी 2011
संत्रास
छोटा सा बडप्पन
लेकिन फिर कभी नहीं दिखा मुझे वहां पर
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश शहर का रेलवे स्टेशन..February 24, 2006 दोपहर के बाद का समय था...हलकी धूप
थी. गुलाबी ठण्ड में थोड़ी धूप अच्छी भी लगती है और ज्यादा धूम गरम भी लगती है ... स्टेशन पर बैठा इंतज़ार कर रहा था और ट्रेन लगभग एक घंटे बाद आने वाली थी ..... बेंच पर बैठे बैठे जाने क्या सोच रहा था ...
चाय ..... चाए .....की आवाजें या फेरी वालों की आवाजें रह रह कर मेरी तन्द्रा तोड़ देतीं ........वहीँ स्टेशन पर पड़े दानों के पीछे चार पांच कौए आपस में झगड़ने का उपक्रम कर रहे थे ...जिनके खेल को मै बड़ी तन्मयता से बड़ी देर से देख रहा था ... इसी बीच मुझे किसी के गाने की आवाज़ ने चौकाया ..... कोई गा रहा था दूर प्लेट फार्म पर ... आवाज़ तो अच्छी नहीं थी पर जो कुछ वो गा रहा था उसके शब्द मुझे उस तक खीच ले गए ...
कद लगभग ढाई से तीन फुट के बीच ही था उसका ... पर उम्र लगभग ३० के आस पास रही होगी
उत्सुकता वश बहुत से लोग उसके करीब आ गए और गाना सुनते रहे ,....
किसी ने एक दो रूपया दिया भी उसे .... पर उसका गाने का ढंग और उसके गीतों का चयन मुझे छू रहा था
कुछ देर बाद जब थोड़ी फुर्सत सी हुई तो मैंने उत्सुकता वश उसे अपने पास बुलाया और बात करने लगा.....
बताया कि मेरा घर यही प्रतापगढ़ के पास चिलबिला स्टेशन के पास ही है
माँ बाप का इकलौता हूँ ....बाबा रहे नहीं ..... अम्मा हैं
अब मेरी हालत तो देख ही रहे हो बाबू
और कोई काम तो कर नहीं सकता सिवाय इस के,.......
मुझे गाने का बहुत शौक था तो गाने लगा हूँ बचपन से ही
..........मैंने कहा आज कल तो विकलांगों के लिए सरकार बहुत कुछ कर रही है
.......... सरकार क्या करेगी ज्यादा से ज्यादा एक साइकिल देगी या फिर रेल का किराया कम कर देगी और कुछ कर नहीं सकता पढ़ा लिखा भी नहीं हूँ
.................................................
एक बार सर्कस वाले आये थे कहने लगे चलो हमारे साथ हम तुमको पैसे भी देंगे और देश बिदेस घूमना हमारे साथ
....... फिर?
पर साहब मेरी माँ का क्या होगा यहाँ पर ... बाबा(पिता) रहे नहीं.......
अम्मा बीमार रहती हैं ..... दमे की मरीज़ हैं तो .......
अब उनकी देख रेख मै नहीं करूँगा तो कौन करेगा .....कहती हैं तू चला जा सर्कस में ..... पर बाबू जी ....... अम्मा को छोड़ कर जाने का दिल नहीं करता ....उसकी बातों में अम्मा के लिए प्रढ़ अपनापा और संवेदना झलक रही थी
बहुत मयाती हैं हमका अम्मा
और फिर औलाद किस दिन के लिए होती हैं........
जौ हमहीं चले जायेंगे छोड़ कर ....... तो और कौन साथ देगा ?
आज देर होई गई आवे मा....... अम्मा की तबियत ज्यादा खराब होई जात है सर्दी मा..!!
आज तो हमरो तबियत कुछ ढीली है .......मगर का करी .... दवाई ले जाय का है ...... यही बरे आवे का पड़ा( इसी लिए आना पडा)
.....दिन भर में कितना ?
अरे दिन भर में कितना का ....... कभी 20-30 रुपिया तो कभी भीड़ भई तो 70-80 रुपिया भी होई जात है दिन भर मा .........
पर उसके स्वभाव में लाचारी नहीं दिखी मुझे ....... एक चमक थी आत्म विश्वास की ......
मैंने ज्यादा पूछ ताछ करना ठीक नहीं समझा ......
मैंने कहा मेरे लिए एक दो गाने गाओगे?
बोला हाँ साहब क्यों नहीं
फिर अपने सोनी के मोबाइल फोन से उसका गाना रिकार्ड किया ......
जो कुछ हो सका दिया भी .....
पर अपनी माँ के लिए उस के भाव और बातें आज भी याद आती हैं
जब भी उधर से गुजरता हूँ , नज़रें ढूंढती रह जाती हैं उसे
लेकिन फिर कभी नहीं दिखा मुझे वहां पर
कभी कभी लगता है हम पढ़ लिख कर ...... सर्विस, व्यापार के चक्कर में अपनों से और अपने घर से इतनी दूर हो गए हैं ...
पैसे, उपहार ... चाहे जो भेज दें पर अपने बड़ों के पैर छूने की अहक इस "बनावटी बडप्पन" में कहीं घुट जाती है...
मै ये भी आपको बताना चाहूँगा कि .... मैंने उस से ये भी कहा था कि मै तुम्हरी बात अगर हो सका तो कहीं आगे ले जाऊँगा और तुम्हरी गाने की कला का कोई कद्र दान ढूँढूँगा ...... पर मेरे पास कोई ऐसा माध्यम नहीं था ...इस ब्लॉग के माध्यम से आज फिर सक्षम लोगों से गुज़ारिश करना चाहूँगा कि यदि आप कुछ कर सकें तो मै दोबारा उसे ढूँढने की कोशिश करूँगा ...
उसने जो गाया मै उस को लिख भी देता हूँ
हो सकता है कोई इस पोडकास्ट को सुन न पाए --
१- पढ़ने को मेरा उसने खत पढ़ तो लिया होगा
हर लफ्ज़ मगर कांटा बन बन के चुभा होगा
कसिद् ने खुशामद से क्या क्या न कहा होगा
शायद किसी भंवरे ने मुह चूम लिया होगा
शबनम के टपकने से क्या कोई कली खिलती
बेटा किसी बेवा का जब दूल्हा बना होगा
शादी में उस माँ का आंसू न रुका होगा
धनवान कोई होता तो धूम मची होती
निर्धन का जनाज़ा भी चुपके से उठा होगा
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२-
सर झुकते नहीं देखा किसी तूफ़ान के आगे
जो प्रेमी प्रेम करते हैं श्री भगवान के आगे
लगी बाजार माया की इसी का नाम है दुनिया
यहाँ ईमान बिक जाता फकत एक पान के खाते
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पाती
पूजा के फूल
ये ही परिणति है क्या
चढ़ते है डाली से टूट
ईश चरणों में
मात्र अहम् पोषण को
मर्दन को शोषण को
अपनी ही जड़ से हो दूर
चूर हो किसी की अर्थी पर
चढ़ते भी तनिक न लजाते है
बनते है प्रीती का सिंगर
वार तन मन
मधु सेज भी सजाते है
गाते है झूम झूम
जब तक हों डाली पर
गाते इतराते है
उपवन पर माली पर
विधना के हाथों
क्यों तोड़ दिए जाते है
छोड़ दिए जाते है
पथरीली राहों पर
कैसे ये सृष्टि भला
दारुण दुःख ढोती है
धिक् है प्रलय कंदराओं में
सोती है
००००००००००००००००००००००००००
प्रकाश पर्व ..
मेरे द्वार पर जलते हुए दिए
तू बरसों बरस जिए ...
आंधियां सहना
मगर द्वार पर ही रहना
क्योकि यही है
मेरी अभिलाषा
मेरी आकांक्षा
मेरी चाह
कि सदा आलोकित करना
द्वार से गुज़रती हुई राह
क्योकि जब कोई राही
अपनी राह पायेगा
प्रकाश से दमकता कोई चेहरा
मुस्कुराएगा
तो उजाला मेरी बखार तक न सही
अंतर्मन तक जरूर आएगा
अंतर्मन तक जरूर आएगा
.......आपका पद्म
बेटा!!… मेडल जुगाड़ से जीते जाते हैं ….समझे?
रघुनाथ मुंशी जी ने पूरे क्लास को संबोधित किया … गाना वाना आवत है कौनो
को ? सरकारी प्राइमरी और कान्वेंट की नर्सरी में फर्क के नाम पर बहुत कुछ
होता है… कहना ही क्या … फ़िलहाल … जाने कैसे और क्यों मुझे खड़ा किया गया
और “कौनो गाना सुनाव बेटा" का आदेश मिला… उस समय अकल कम ही होती थी मेरे
पास… अपने आप को देश भक्त समझा करता था(शायद आज भी)… इसीलिए बहुत सारे
देश भक्ति के गाने याद रहा करते थे … मुंशी जी का आदेश था … महुवे के पेड़
के नीचे (जहाँ अब ग्राम सभा का खडंजा बिछ गया है वहीँ) काँपती टांगों पर
खड़े हो कर लगभग बेसुध सा अपने जीवन का पहला सार्वजनिक गीत गाया था …
जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती हैं बसेरा .. वो भारत देश है मेरा …
वो भारत देश है मेरा … बाद में पता चला मेरा चयन रेडक्रास की स्कूल टीम के लिए किया गया था… मै
अपनी क्लास में सबसे छोटा दीखता था( शायद था भी) क्योकि उस समय के जी और
नर्सरी नहीं होती थी … “पहली”, फिर “बड़ी” और फिर सीधे दुसरे क्लास में …
मैंने दूसरा क्लास नहीं पढ़ा .. सीधे पहले से तीसरे में.. इस लिए सब से
छोटा था. टीम की तैयारियां पूरे जोरों पर होतीं… ग्रुप में आठ लड़के …कुछ
तो ढपोंगे थे … रेडक्रोंस के लिए तैयार नाटक के डायलोग याद करते,
डिप्थीरिया, काली खाँसी और टिटनेस का टीका “DPT” सीखते… बैसिलस कालवेटिव
ज्युरिल(BCG) के टीके याद करते … चेचक के समय क्या क्या सावधानियां होनी
चाहिए… इमरजेंसी में मुंह से सांस देना, फिर एक दो तीन .. तीन बार सीने
पर दबाव देना फिर एक…दो.. तीन … सांस देना … मतलब कि बहुत कुछ… जनपद
स्तर, मंडल स्तर और राज्य स्तर या नेशनल… जहाँ भी गयी टीम प्रथम स्थान ही
लेकर आई … एक थे राम नारायण पंडिज्जी ( पंडिज्जी माने गुरु जी)….. जिसने लोटपोट
कोमिक्स पढ़ी हो वो डाक्टर झटका को हुबहू याद कर लें… ऐसे ही थे पंडिज्जी
… “ब्बता रहा हूँ जो है…समझे? " उनका तकिया कलाम होता … ब्बता रहा हूँ जो
है ऐसा ..समझे?? … ब्बता रहा हूँ जो है वैसा …समझे??…. वैसे तो पंडिज्जी
क्राफ्ट के मास्टर थे लेकिन काम था टीम बनाना और लड़वाना.. रेडक्रोस,
सेंटजान एम्बुलेंस,मेकेंजी, और स्काउटिंग आदि कोई भी कम्पटीशन हो … पंडित
जी हर विधा में निपुण… साम दाम दंड भेद सारे के सारे उनकी उंगलियों
पर…रघुनाथ मुंशी जी उनके सहयोगी हुआ करते…क्राफ्ट के मास्टर होने के कारण
खूबसूरत डायरियां बनाते जिनमे हम रेडक्रास के कैडेट्स द्वारा किये गए
स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यों और जागरूकता अभियानों का ब्यौरा होता… हम पूरे मनोयोग से जीतने के लिए ही निकलते थे … हम जहाँ भी जाते पूरा लाव
लश्कर साथ चलता … मै छोटा था … मुश्किल से अपनी अटैची उठा पाता.. बेडिंग
कोई सहपाठी या पंडित जी ही उठाते … ट्रेन में, बस में, होटल में जहाँ भी
जाते खूब धमाल मचाते…. गाते हुए, हँसते हुए खूब मज़े करते … (Smile) जो भी मेडल हम जीतते वे हमें नहीं मिलते थे बल्कि स्कूल में अनुदान के
रूप में ले लिए जाते …. अगले साल आने वाली प्रतियोगिताओं के बच्चे उन्हें
लगा कर परेड में भाग लेते थे … इस तरह सब से ज्यादा मेडल हमारी टीम के
होते थे. ये सब यूँ लिखा मैंने …. कि पंडिज्जी को सारी कलाएं आती थीं… टीम के
बच्चों को खूब खिलाते पिलाते…खूब सिखाते भी …जिस होटल पर टोली पहुँचती
होटल वाला खुश…छह सात दिनों के लिए ढेर सारे ग्राहक मिल जाते लेकिन वो
बात अलग, कि टीम की वापसी के समय पंडिज्जी के पास तीन चार दर्जन गिलास और
कुछ इससे ज्यादा ही दर्जन चम्मचादि हुआ करते … Winking smile होता यह था
कि जिस होटल वाले ने परेशान किया,अच्छा खाना नहीं दिया या शोषण किया
उसका बदला पंडिज्जी ऐसे ही लेते थे… अगले दिन आगरा में कम्पटीशन का फाइनल था… रेडक्रास और सेंटजान
एम्बुलेंस का… हम सब कल होने वाले वाइवा और प्ले की तैयारियों में व्यस्त
थे…देर रात पंडिज्जी लगभग बीस पच्चीस सर्टिफिकेट, जिन्हें कल विजेताओं को
वितरित किया जाना था लिए हुए कमरे में घुसे ….सभी सर्टिफिकेट्स पर तीन या
चार अधिकारिकों के हस्ताक्षर पहले से थे… सिर्फ नाम भरा जाना था … सुन्दर
सुन्दर हर्फों में सब टीम मेम्बर्स के नाम लिखे गए…प्रथम स्थान की घोषणा
भी लिखी गयी …. और कमाल देखिये … कल आने वाले दिन में हम प्रथम घोषित
किये गए और अपने हाथों से लिखे सर्टिफिकेट भी प्राप्त किये … हमसे रहा नहीं गया तो पूछ बैठे … पंडिज्जी ! सर्टिफिकेट पर आपने कल ही
प्रथम स्थान प्राप्त किया" लिख दिया था … ये कैसे हुआ… पंडिज्जी ने पान
खाया हुआ मुंह थोड़ा ऊपर उठाया और अत्यंत रहस्यमयी मुस्कान बिखेरते हुए
बोले…. ब्बता रहा हूँ जो है……बेटा….!!! मेडल जुगाड़ से जीते जाते हैं …समझे? (हुआ यह था कि किसी स्कूल वालों ने पंडित जी को चैलेन्ज दे दिया था.. इस
बार कम्पटीशन जीत के दिखाओ) पिछले दिनों गाँव गया तो अचानक पंडिज्जी से मुलाक़ात हो गयी…पंडिज्जी
पणाम! …बहुत खुश हुए अपने पुराने “टोली नायक” से मिल कर … पंडिज्जी की
उमर ढल चुकी है…रिटायर हो चुके हैं … अपने पुत्र धौताली के साथस्कूल खोला
है … हाई स्कूल और इंटरमीडियेट में गारंटीड सफलता के लिए सारे जुगाड़
युक्त स्कूल… Smile
Posted via email from हरफनमौला
आज़ाद पुलिस संघर्ष गाथा-४ (मुंबई में पुलिस का चालान काटेगी आज़ाद पुलिस)
आशा है मेरी पिछली पोस्टों आज़ाद पुलिस संघर्ष गाथा-१, आज़ाद पुलिस संघर्ष गाथा- २ और आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा –३) के माध्यम से आज़ाद पुलिस से आप पर्याप्त परिचित होंगे …नहीं हैं तो कृपया उक्त पोस्टें पढ़ें…. इन पोस्टों को पढ़ कर मीडिया और ब्लॉगजगत से जुड़े हुए बहुत से लोगों द्वारा प्रतिक्रियाएं मिली थीं… कुछ संस्थाओं और लोगों ने स्वयं ब्रह्मपाल से मिल कर उनके संघर्ष और जज्बे को समझा-जाना … कुछ ने आर्थिक सहायता भी दी… लेकिन इस सहायता राशि को भी अपने व्यक्तिगत खर्च के लिए न रख कर समाज सेवा में अर्पित कर दिए गए…. तीन दिन पहले कहीं रास्ते में फिर से ब्रह्मपाल से मेरा मिलना हो गया… बातें होती रहीं… आज़ाद पुलिस के अगले मिशन के बारे में पूछने पर पता चला कि निकट भविष्य में आजाद पुलिस द्वारा एक गुटखे पर तिरंगे झंडे की तस्वीर और नाम का बेजा इस्तेमाल करने से तिरंगे का अपमान होता है. इस कंपनी के विरोध में जैसा कि ब्रह्मपाल ने अनेक बार प्रशासन को आगाह दिया था प्रशासन तक बात बखूबी पहुँच भी चुकी थी लेकिन ब्रह्मपाल की आवाज़ नक्कारखाने में तूती की आवाज़ ही साबित हुई और उस कंपनी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गयी… इस कंपनी के विरोध में शीघ्र धरने पर बैठने हेतु उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को सूचना भेजी जा रही है…
इसके अतिरिक्ति जिस पुलिस और प्रशासन ने कभी ब्रह्मपाल की सुध नहीं ली... उसकी आवाज़ बंद करने के लिए सिरफिरा करार देते हुए बेवजह बार बार जेल में ठूंसती रही उसी पुलिस की कार्यप्रणाली के सुधार के सपने देखने वाला ब्रह्मप्रकाश(आज़ाद पुलिस) कुछ ही महीने में मुंबई पुलिस की खबर लेने मुंबई जाने वाला है… बताया कि २१ मई २०११ को अपने रिक्शे सहित मुंबई जाकर मुंबई पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार और मौलिक कमियों को उजागर करने का प्रयास करेगा … इसके लिए आज़ाद पुलिस का अनोखा तरीका है पुलिस का चालान करना… ये जुनूनी वन मैन आर्मी अपनी स्वयं की चालान बुक रखता है… जहाँ कहीं पुलिस की कमियाँ देखता है… तुरंत चालान काटता है … चालान पर उस पुलिस वाले के हस्ताक्षर भी करवाता है और चालान एस एस पी अथवा उनसे उच्चतर अधिकारी को बकायदा कार्यवाही करने के अनुरोध के साथ प्रस्तुत किया जाता है… इस प्रयास में कई बार पुलिस का कोप-भाजन बनने, मार खाने, हवालात जाने के बावजूद उसके जज्बे में कोई कमी नहीं आती और अपना संघर्ष जारी रखता है, मुंबई जाने के सम्बन्ध में दिल्ली पंजाब केसरी समाचार पत्र ने दिनांक ०१-१२-१० के अंक में खबर को प्रमुखता दी है…
यहाँ अवगत कराना चाहूँगा कि ब्रह्मपाल के अनुसार किसी सहायता अथवा अनुदान राशि का एक पैसा अपनी जीविका के लिए प्रयोग नहीं करता… आज़ाद पुलिस को भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को उजागर करने के लिए उसे एक कैमरे की आवश्यकता थी … जय कुमार झा जी की सलाह पर इस तरह के ईमानदार और आम जनता के लिए होने वाले संघर्ष पर छोटी-छोटी सहयोग राशि के लिए hprd के लिए अपने वेतन से प्रतिमाह ५० रूपए का एक छोटा सा फंड बनाना शुरू कर दिया था… आशा है इस प्रयास के लिए मेरे फंड से शीघ्र ही एक कैमरा लिया जा सकेगा…
आज़ाद पुलिस की मुहिम और संघर्ष के प्रति ब्लॉग जगत में भी कई मित्रों का सहयोग लगातार प्राप्त होता रहा है…हाल ही में ब्लॉग जगत के कुछ सक्षम मित्रों की संवेदनाएं ब्रह्मपाल के प्रति शिद्दत से दिखी … इस बात से आज़ाद पुलिस की नगण्य सी मुहिम परवान चढेगी ऐसा विश्वास है… इस पोस्ट के माध्यम से आप सब से अपील है कि आज़ाद पुलिस की मुंबई मुहिम पर यथा संभव यथा योग्य सहयोग करें…
आज़ाद पुलिस की आगे की गतिविधियों के लिए नया ब्लॉग बना दिया गया है जिससे लोग आसानी से आज़ाद पुलिस और उसकी मुहिम से सीधे जुड़ सकें… ब्लॉग पर जाने के लिए क्लिक करें <आज़ाद पुलिस> पर
आपका पद्म सिंह ९७१६९७३२६२
ठहर….ठहर….जाता कहाँ है…
० क्यूँ रे मुए तेरा दिमाग फिर गया है क्या ?
-क्या हुआ जी .. कुछ गलती हो गई मेरे से ?
० मै कहती हूँ तेरे घर में माँ बहन नहीं है क्या?
-क्यों ऐसा क्यों कहती हैं बहन जी … मैंने तो आपको कुछ भी नहीं कहा
०किसी और को ही क्यों कहा … तुम्हारे अपने घर में माँ बहन नहीं है क्या …!!
-लेकिन बताइये तो सही मेरे से गलती क्या हो गयी? …
अरे तू सठिया गया लगता है मुझे तो .. तभी तो दूसरों की लुगाइयों को अपनी माँ बहन बनाता फिर रहा है
- लेकिन बहन मैंने आपको तो कुछ नहीं बोला ? आप तो खामखा हत्थे से उखड़ी जा रही हैं
० देख तू अपनी ज़बान को लगाम दे… एक तो बहन जी बहन जी बोले जा रहा है ऊपर से शराफत का ढोंग भी दिखा रहा है … बहन होगी तेरी बीवी… खबरदार दुबारा बहन बोला तो ज़बान खींच लुंगी…. मै तुझे बहन नज़र आती हूँ..?
-माफ करना ब् ब् बहन …सॉरी … माता जी… मै आपका मतलब समझ नहीं पाया था …
अरे मुए… तू ऐसे बाज़ नहीं आएगा …. अब माता जी पर उतर आया? …इतनी भी तमीज़ नहीं कि किस उमर वाली को क्या बनाया जाता है? चखाऊं तुझे मज़ा अभी … ??…
-लेकिन मैंने तो आपको माताजी ही तो कहा है कोई गाली तो नहीं दी……….अब बहन न कहूँ …. माता जी न कहूँ तो और क्या कहूँ….
० आजकल के मर्दों को तमीज़ नाम की चीज़ नहीं रह गयी है….और उसमे ओल्ड फैशन्ड लोगों ने वैचारिक स्वतंत्रता की वाट लगा रखी है… अरे भाभी, मैडम मोहतरमा या निक नेम से बुलाते तुम्हारी जीभ जल जाती है क्या ?………देखने में तो पढ़े लिखे मोडर्न लगते हो…काम गँवारों जैसे … और फिर रिश्ते बनाते समय कम से कम उम्र का तो ख़याल कर लिया करो ??………किसी ने ठीक ही कहा है…. पढ़ लिख कर ज्ञान तो सब बटोर लेते हैं…लेकिन कुछ लोग संस्कार से कंगले ही रह जाते हैं... अरे मोडर्न ज़माना है, जानू, डार्लिंग, स्वीटी वगैरह की जगह माता जी, बहन जी …??? कौन से अजायबघर से आये हो?
-देखिये म्म म्मा मैडम जी…मुझे सिखाया गया था कि पराई स्त्रियों को माँ बहन की नज़र से देखो…. इज्ज़त से पेश आओ… इसी लिए मै…वो ..
० अच्छा तो बात अब समझ में आई … मोडर्न कल्चर तो तुम लोग सूँघ भी नहीं पाए हो अभी तक … ये सूट टाई देख के मै धोखा खा गयी थी… अभी हम लोग तुम्हें पापा, अंकल या चचा बोलने लगें तो ..?? चले आते हैं जाने कहाँ से…!!!
-जी वो ऐसा था कि ….
अच्छा अच्छा … एक बात बताओ …. तुम करते क्या हो ?
-वो क्या है कि वैसे तो अपना छोटा मोटा काम है … लेकिन टाइम पास करने के लिए थोड़ी बहुत ब्लोगिंग कर लेता हूँ …
० ओहो .. तो नए नए ब्लॉगर हो … तभी तो कहूँ … ये हर किसी को “जी”, “जी”, भाई साब, सर सर..कहने की आदत कहाँ से सीख ली… वैसे कितने दिन से ब्लोगिंग करते हो..?
-अभी तो नया ही समझिए… फिर भी खा कमा कर दस बारह टिप्पणियाँ खैंच ही लेता हूँ…
० अच्छा ? मतलब अभी ब्लोगिंग के लडकपन के दौर में हो…
- जी ऐसे ही समझ लीजिए….
० ह्म्म्म… तो मतलब तुमने अभी तक कोई गुरु, केयर टेकर, या गाड-फादर नहीं थामा!!!
-नहीं जी… सलाहें तो बहुत सी पढ़ने को मिलती हैं लेकिन मेरे ऊपर कोई “केयर ही नहीं टेकता… “
० तुम्हें अभी तक मेरी बात समझ में नहीं आई लगता है… अभी तक जी, जी लगा रखा है … इंटरनेट और ब्लोगिंग ग्लोबलाइजेशन के नए दौर की शुरुआत है डूड .. वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा यहीं तो परवान चढ़ती है… अब औपचारिकताओं के चक्कर में ही पड़े रहोगे तो एक दूसरे के नज़दीक कैसे आओगे ?…
-देखिये मै सीधा सादा शादी शुदा ब्लॉगर हूँ जी… नज़दीक आ कर मै क्या करूँगा …
० अरे तुम रह गए निरे ब्लॉगर के ब्लॉगर …. मेरा मतलब था कि इस तरह लोगों से जान पहचान कैसे बनेगी कैसे एक दूसरे को जानोगे … फेसबुकिये बनो आर्कुटिंग करो, चैटियाओ तब थोड़ा मोडर्न तहजीब आएगी तुम्हें …
- देखिये जी.. मेरी पत्नी मुझे जब इंटरनेट पर बैठे देखती है, आर्कुट और फेसबुक पर दोस्ती करते देखती है…. ब्लॉग पोस्टों पर महिलाओं के कमेन्ट देखती है उसे जाने क्या हो जाता है…. मेरा जीना हराम करके रख देती है…मुझे निठल्ला, कामचोर जैसी गालियों से नवाजती है और कोसती है सो अलग… मै बड़ी मेहनत से रात भर जाग जाग कर पोस्टें लिखता हूँ …एक तो उनपर टिप्पणी नहीं मिलती ऊपर से घर के साथ साथ ब्लॉग जगत में मेरी इज्जत भी नहीं हो रही है … आप ही बताओ मै क्या करूँ…
० अरे बुद्धू … इसका मतलब तुम कभी ब्लॉगर मीट में नहीं गए लगता है… मैने कई बार इस समस्या हल ब्लॉग जगत के सामने उद्घाटित किया है… आज तुम भी सुनो .. पहले तो ऐसा फील करना शुरू करो कि हिंदी की रक्षा का सारा दारोमदार तुम्हारे काँधे पर है… अगर तुम नहीं लिखोगे तो हिंदी को कोई नहीं बचा पायेगा… दूसरे घर में जितने सदस्य हो सब को ब्लोगिंग शुरू करवाओ… सब से पहले तो अपनी पत्नी के नाम से ही एक ब्लॉग बनाओ… उसकी पुरानी वाली कोई झकास सी फोटो सहित बढ़िया सी प्रोफाइल बनाओ…
-लेकिन उसे तो कुछ भी लिखना विखना नहीं आता… हाँ किसी की टांग खिंचाई और मुंहजोरी बेहतरीन कर लेती है…हाँ बचपन से उसे नेतागीरी का बड़ा शौक रहा है जी… लेकिन चूल्हे चौके में फंस कर बेचारी…!!!
लो कल्लो बात, … ब्लोगिंग के लिए ये चीज़े तो सबसे ज्यादा ज़रूरी हैं… उसके नाम से अल्लम गल्लम कुछ भी दोचार पोस्टें डालो और लोगों को लिंक मेल कर दो… इससे भी बात न बने तो दोचार गुरुघंटाल… मठाधीश टाइप के ब्लॉगरों के ब्लॉग पर जा कर खरी खरी जो लगे लिख दो…. बस देखो… अगर मोडरेटर से बच गयी तो एक टिप्पणी ही तुम्हारी बीवी को (बद)नाम कर देगी….फिर होगा ये कि ब्लोगिंग की रीति के हिसाब से नया पाठक(शिकार) समझ के दोचार लोग ज़रूर उसकी पोस्ट पर “दिल को छू गया" “ज़बरदस्त" “आपकी लेखनी चूमने को जी चाहता है", जैसे दो चार कमेन्ट दे ही जायेंगे …और नहीं तो फेमिनिस्ट ब्लॉगर तो हैं ही बैकअप के लिए… धीरे धीरे जितनी उजड्डता करेगी उतनी ही नेतागीरी चमकती जायेगी… उतनी ही चर्चा में रहेगी …बिग बॉस नहीं देखते क्या ?
-अच्छा जी.. फिर मेरी पत्नी का शौक पूरा हो जाएगा ?
० और नहीं तो क्या ? … तारीफ़ किसको नहीं अच्छी लगती है… सच्ची हो या झूठी,… धीरे धीरे उसे उसे भी ब्लोगिंग की लत पड़ जायेगी…एक पोस्ट लिखते ही किचेन से दौड़ दौड़ कर टिप्पणी गिनने पहुंचा करेगी… रातों रात कनाडा से ले कर छत्तीसगढ़ तक शोहरत हो जायेगी …पत्नी इंटरनेशनल हो जायेगी … आप भी खुश वो भी खुश… और इससे दोहरा फायदा भी होगा हिंदी को (आभासी)तरक्की भी मिलेगी… और ऐडसेंस के हिंदी ब्लॉग पर आने से कमाई के रास्ते भी खुलेंगे…
-देखो जी … आप तो मुझे महारथी लग रही हैं…आपके ब्लोगिंग ज्ञान से मै अभिभूत हूँ… अगर आपको बुरा न लगे तो दोचार टिप्स और दें सफल ब्लॉगरी के…
० हाँ अब लाइन पर आते दीख रहे हो… संगत में रहोगे तो तुम्हें कहाँ से कहाँ पहुँचा दूंगी … लेकिन इसके लिए सबसे पहले शराफत छोडनी पड़ेगी तुम्हें… खुद कुछ भी करो… लेकिन दूसरों को कोसने से बाज़ मत आओ…. दुनिया में जाने क्या क्या घट रहा है…सब लिख मारो…ब्लॉग जगत को अपनी देख रेख में रखो…किसी की मज़ाल न हो कि तुम्हारे विचारों से इतर कुछ भी लिखे… दाना पानी ले कर चढ़े रहो… अपने ब्लॉग को निजी हमाम कम पाखाने जैसा समझो …. जहाँ दिन भर की घर और दुनिया भर से मिली खुन्नस को दूसरों को लक्ष्य करते हुए वमन कर दो… इससे तुम्हारा चित्त शान्त हो जाएगा… और तुम्हें नींद भी अच्छे से आएगी …(दूसरों की उड़े सो उड़ जाए )
-मुझे माफ कर दीजिए मै अज्ञानी…आपको समझ न पाया था … आप तो ब्लॉग जगत की डॉली निकलीं… जो अपने (उजड्डपन के) दम पर बिगबॉस से अपना तम्बू उखड़ने नहीं देती हैं … आप मेरे ऊपर कृपा करें…मै कोई लेखक तो हूँ नहीं… न ही मुझे कविता शविता, रचना वचना करनी आती है… ऐसे में अपनी ब्लोगिंग की दूकान कैसे चलाऊं? जरा इस पर भी अपने आशीर्वचन कहें
० चलो तुम कहते हो तो कुछ मन्त्र और ले लो … ये बहुत आसान है… एक ब्लॉग ऐसा बनाओ जो किसी कम्युनिटी, लिंग अथवा किसी धड़े विशेष का प्रतिनिधित्व करता हो… स्वयं उसके मोडरेटर बन जाओ और ढेर सारे कंट्रीब्यूटर शामिल कर लो… बस जी…तुम्हारा मल्टीप्लेक्स थियेटर तैयार है… टिप्पणियों का मोडरेटर चालू रखो… अपने हिसाब की टिप्पणियाँ रिलीज़ करो बाकी टिप्पणियों का गर्भ में ही घोट दो… फिर देखो… बिना तुम्हारे कुछ किये धरे दुकान चल निकलेगी… लेकिन हाँ … एक बात ज़रूर याद रखना… बीच बीच में किसी ब्लॉग अथवा पोस्ट के विषय में तंज करते हुए एक दो पोस्ट ज़रूर डालते रहना … इस से तुम्हारा ब्लॉग चर्चा में बना रहेगा…
- अभिभूत हूँ… आपने मेरे ज्ञान चक्षु खोल दिए… मै बेचारा यदि आपके सानिध्य में न आता तो अज्ञानी ही मर जाता … आगे और क्या आज्ञा है आपकी…
० देखो … चंद बातें और याद रखो… खुद भले कोई सृजनात्मक पोस्ट न लिखो… लेकिन सदैव हिंदी हित की बातें… ब्लॉग हित की बातें… और नए ब्लॉगर्स के लिए सलाहें… पुराने ब्लॉगर्स पर चुटकियाँ…अपनी पोस्टों के रूप में डालना मत भूलना … इससे तुम बरिष्ठ ब्लॉगर्स में शामिल हो जाओगे…
- जी मै साSब समझ गया … अब आप अंतिम मन्त्र और दे कर मुझे कृतार्थ करें…
० अंतिम बात सदैव ध्यान रखना … एक हाथ दे एक हाथ ले की बात कभी मत भूलना … कोई भी एग्रीगेटर खोल कर सारी पोस्टों पर जाना .. धडाधड… दो तीन सौ पोस्टों पर आह वाह की टिप्पणी कर आना… पढ़ना कोई ज़रूरी नहीं … बाक़ी सब भली करेंगे राम..
-(घुटनों पर बैठ कर)…. हे मेरी ब्लॉगर माता… मै अज्ञानी मुझे कुछ नहीं आता … आपका ज्ञान सर आँखों पर … हे मेरी बहना … अगर ब्लॉग जगत में है रहना… तो याद रखूँगा आपका कहना … जय हो…. जय हो…माते ..
० कमीने …तूने फिर माँ बहन बोला… इत्ती देर से तुझे समझा रही हूँ … लेकिन तू ठहरा निरा गधा…. तेरे घर में माँ बहन नहीं है क्या …जो राह चलते किसी को भी माँ बहन कहने लगता है… ठहर तुझे मज़ा चखाती हूँ…
०…… ठहर जाता कहाँ है… मै तेरी खबर लुंगी …छोड़ने वाली नहीं हूँ तुझे मै… अपने ब्लॉग पर लूँगी तेरी …. तू तड़पेगा अपनी सफाई देने को और तेरी टिप्पणी का गला मोडरेटर में ही घोंट दूंगी…ओय…रुक ..!!!
…ओए…. ठहर ठहर … जाता कहाँ है…SSSSSSS!!!
(निर्मल हास्य)…… द्वारा पद्म सिंह
यूँ न इतराओ अहले करम जिंदगी …. पद्म सिंह
अहले करम-एहसान करने वाला
शरारा-चिंगारी
आफताब-सूरज
पद्म सिंह - ०६/०१/२०११
मंजन घिसते हैं पिया, मुन्नी है बदनाम ...
मनमोहन मजबूर हैं गठबंधन सरकार
मंहगाई की मांग पर फैला भ्रष्टाचार
फैला भ्रष्टाचार, करें जनता का दोहन
गठबंधन के मारे बेचारे मनमोहन
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जमा विदेशी बैंक मे नेताओं की लाज
इसी फेर मे सब पड़े कौन खुजाये खाज
कौन खुजाये खाज राज खोलें भी कैसे
भारी तिजोरी लूट पाट कर जैसे तैसे
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हींग लगे ना फिटकरी जमे अनोखा रंग
राजनीति के मज़े हम देख रह गए दंग
राज नीति के मज़े, मज़े की बाबा गीरी
भोली जनता के धन से भर रहे तिजोरी
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जिसकी जितनी चाकरी उसकी उतनी धार
मैडम के दरबार मे चमचों की भरमार
किसे पता किस्मत वाले ताले खुल जावें
मजबूरी मे कब प्रधान मंत्री बन जावें
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कलमाड़ी मायूस हैं, राजा से गए हार
अवसर था बेहद बड़ा छोटी पड़ गयी मार
छोटी पड़ गयी मार, प्रभू फिर दे दो मौका
फिर से देखो कलमाड़ी का छक्का चौका
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राजनीति का राज है लूट सके तो लूट
हाथ मसल पछताएगा, कुर्सी जाये छूट
जल्दी जल्दी लूट इसी कुर्सी के बूते
वरना जनता आती है ले ले कर जूते
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होली का आगाज है, मन मे भरी उमंग
पर मंहगाई देख कर, जनता रह गयी दंग
जैसे आनन फानन मे, प्याज उगाई यार
फिर से कुछ जादू करो, प्यारे शरद पवार
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दुष्ट मनचले पा गए हैं जैसे बरदान
फैली जब से खबर है शीला हुई जवान
शीला हुई जवान, नयी पीढ़ी बौराई
मंजन घिसते हैं पिया, मुन्नी है बदनाम