आज कहता है वही शख्स भूल जाने को
मैंने जिसके लिए भुला दिया ज़माने को
दिल पे खाता है मगर फिर से दिल लगाता है
दिल्लगी मानता है दिल से दिल लगाने को
किसी दरिया को समंदर का पता क्या मालूम
इक जुनूं राह दिखाए किसी दीवाने को
हो न सैयाद दर्द-मंद मेरी जानिब से
जी नहीं करता के तोडूँ मै कैदखाने को
फ़र्ज़ मजबूर है हैवानियत दिखाने को
फसील सर की सुनेगा कि हुक्मरानों की
बड़ी बुलंदियों पे ताजदार यूँ पहुँचे
अवाम हो गयी मोहताज़ दाने दाने को
सैयाद =शिकारी
फसील= फाँसी देने का यंत्र
………पद्म सिंह ०५-अप्रैल-२०११