अन्दर अन्दर टूट रहा हूं
धीरे धीरे छूट रहा हूं ।
सच्चा केवल मन ही मन है
बाहर बाहर झूठ रहा हूं ।
रामबाण औषधि हूं वैसे
यद्यपि कड़वा घूट रहा हूं।
जीना कुछ आसान नहीं है
पत्थर कोपल फूट रहा हूं।
दुनिया मुझको लूट रही है
या मैं खुद को लूट रहा हूं ।
परत दर परत उतर रहा हूं
जैसे जैसे कूट रहा हूं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
कुछ कहिये न ..