बुधवार, 25 अगस्त 2010

भटकती आत्मा से साक्षात्कार (संस्मरण)


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mix जाने क्यों और कैसे … बचपन में मुझे ऊंचाइयों से गिरने और अजीब अजीब सायों  के बहुत से सपने आया करते … शायद इन्हीं के प्रभाव से धीरे धीरे ऊंचाई से एक डर की  भावना अंदर कहीं घर कर गयी थी .. अगर किसी छत से भी नीचे देखता तो ऐसा लगता कि जैसे अचानक ही नीचे गिर जाऊँगा… या फिर अक्सर सपनों में किसी अँधेरे गहरे कुंए में मुक्त गिरने जैसे सपने देखता …अक्सर घबरा कर उठ बैठता और फिर सो नहीं पाता था … मै जितना भी इन सपनों से बचना चाहता ऐसे  सपने और भी सजीव हो कर   मेरे पीछे पड़ जाते…ऐसे सपनों की वजह से जान कितनी सांसत में होती थी उस समय, ये आज सोच कर हँसी भी आती है…
कुछ बड़ा होने पर मैंने जाने किस अन्तःप्रज्ञा अथवा सहज बुद्धि के कारण डर से जीतने का मन बना लिया…. मुझे अच्छी तरह याद है कि जब भी मुझे कुंए या ऊंचाई से गिरने जैसे सपने आते… मैंने उसे ध्यान से देखना और स्वीकार करना प्रारम्भ किया… अर्द्धचेतन अवस्था में मैंने अपने आपको कई बार गहरे कुँए में गिर जाने दिया और डरते हुए भी साहस कर के गिरते हुए देखता रहा… किसी साए के दिखने पर भी मैंने उसके प्रति हिम्मत से काम लेते हुए देखता रहता… लेकिन इसकी तैयारियां जागने के दौरान ही करता…कई बार तो प्रतीक्षा भी करता इस तरह के सपने आने की .. अपनी छत की तीन इंच चौड़ी मुंडेर पर कांपते पैरों से लेकिन सप्रयास  चलने  की कोशिश करता… जानबूझ कर छत से नीचे देखता रहता… या मन ही मन ऐसी परिस्थितियों से लड़ने की कोशिश करता … धीरे धीरे मुझमे  हिम्मत आती गयी और  इस तरह के सभी सपने आने पूरी तरह से बंद हो गए… अब तो  मुझे यदा कदा ही सपने आते हैं.. आज  किसी भी अँधेरे, भूत या ऊंचाई आदि के डर से एकदम मुक्त हूँ…. किसी भी अँधेरी सुनसान या भुतहा जगह पर आधी रात चले जाना मेरे लिए मामूली बात है… कई बार तो शर्त लगा कई किलोमीटर दूर  भयानक पुरानी खंडहर  मंदिरों में रात बारह एक बजे बेहिचक हो कर आया हूँ… पर अब मुझे इन सब से डर नहीं लगता कभी … यद्यपि सतर्कता और सावधानी के प्रति लापरवाह भी नहीं हूँ …. इस तरह के सपनों का कारण कहीं न कहीं असुरक्षा की भावना से सम्बंधित होती है … बच्चों के कोमल मन मे कब कैसी चीज़ें घर कर जाती हैं, माता पिता या परिवार जान भी नहीं पाता.. और न बच्चा उसे अभिव्यक्त कर पाता है … और अकेले घुटता है…  बचपन की ये भावनाएं और अनुभव पूरे जीवन उसके साथ चलते हैं और कहीं न कहीं उसके व्यवहार और सोच को प्रभावित करते हैं…
index इसी क्रम में मुझे छह सात वर्ष पुरानी एक सत्य घटना याद आती है… जब मेरा साक्षात्कार एक भटकती आत्मा से हुआ… मुझे गाज़ियाबाद आये हुए कुछ ही वर्ष हुए थे … बिजली पानी  की चौबीस घंटे सुविधा को देखते हुए मैंने किराए पर न रह कर विभागीय आवास में ही रहना ठीक समझा… मेरा उक्त  आवास अन्य आवासों से हट कर है दोनों ओर घास के लान और किचेन गार्डन के लिए जगह होने के कारण अलग थलग सा लगता है… उस दिन पहली बार मै अपना कम्प्युटर(डेल का पेंटियम-3) खरीद कर लाया था… नए कम्प्युटर के प्रति उत्सुकतावश मै बाहर वाले कमरे में खिड़की के पास कम्प्युटर ले कर बैठा था… घर में सब सो गए थे … कम्प्युटर पर आँखें गड़ाए हुए मुझे रात काफी देर हो गयी थी…  बाहर की लाईट खराब होने के कारण धुप अँधेरा पसरा हुआ था … मै खिड़की के एकदम पास बैठा था … अचानक मुझे ऐसा लगा जैसे कोई मेरी खिड़की पास से दबे पाँव गुज़रा हो…. पहले तो मैंने नज़रंदाज़ कर दिया कि मेरा वहम हो सकता है …. आधे मिनट में ही खिड़की की मच्छर जाली से बाहर किसी की साँसों की आवाज़ सुनाई दी ….. और फिर से कोई दबे पाँव खिड़की को पार कर गया … अंदर लाईट जल रही थी … इस लिए बाहर के अँधेरे में कुछ भी नहीं दिख रहा था …. मैंने कम्प्युटर से नज़र हटाये बिना उस आहट के प्रति सजग हो गया था….आहट इतनी स्पष्ट थी कि एक बार तो मेरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गयी … मैंने उसी समय उस आहट से निपटने का मन बना लिया …. धीरे से उठा और अंदर की लाईट बंद कर ली … जिससे मेरी किसी हरकत का पता बाहर वाले को न लगे …. अंदर अँधेरा होने पर मै उठा और दरवाजे तक दबे पाँव गया… चटकनी हौले से खोला और अचानक दरवाजा खोल कर बाहर आ गया … बाहर धुप अँधेरा फैला था … ऊपर से कम्प्युटर स्क्रीन पर घंटों आँखें गड़ाए होने के कारण  आँखों के आगे चमकीला धब्बा सा बन गया था,…. मै कुछ भी नहीं देख पा रहा था … चूंकि आहट आवास के बगल वाली तरफ की खिड़की के पास थी इस लिए मै अँधेरे में अपनी आँखे फाड़े बगल के कनेर के पेड़ के झुरमुट हटाते हुए गौर से देखने का प्रयास किया…. आप यकीन मानिए जो मंज़र था उसे देख कर कोई भी कमज़ोर दिल का इंसान गश खा कर गिर सकता था … मुझे हल्का हल्का दिखने लगा था … मैंने देखा कि बड़े बड़े खुले बाल कन्धों पर बिखराये … कुर्ते पायजामे में एक साया दीवार से सटा…. दीवार के मोड़ के कोने में चुपचाप दोनों हाथ ऊपर उठाये खड़ा था … इतना देखते ही एक बार तो जैसे बिजली सी कौंध गयी पूरे शरीर में … सेकेण्ड के पौने हिस्से में एक एक रोम सिहर गया … पर अगले ही पल मैंने अपने आपको सम्हाला और उसके थोड़ा और नज़दीक गया … और डाट कर पूछा … “कौन है वहाँ?” ………साया अब भी बिना  हिले डुले चुपचाप  बुत की तरह खड़ा था… मै एक दो कदम और आगे बढाए और फिर चीख पर पूछा “कौन है उधर?”….. अब मेरी और उसकी दूरी पांच फिट की रही होगी…. अचानक साया उछला और मेरे एकदम पास आ कूदा और मेरी आँखों में घूरते हुए स्त्री आवाज़ में बोला… “मै भटकती आत्मा हूँ” … अब आप अंदाज़ा लगाइए कि ऐसी स्थिति में एक इंसान की क्या हालत हो सकती है…. मै भी उसी फुर्ती से एक कदम पीछे हटते हुए अपने आप को हर परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार कर चुका था … मैंने फिर पूछा “यहाँ क्यों आई हो” … आत्मा मुझे पहले की तरह घूरती रही … फिर रहस्यमय आवाज़ में बोली …. मेरे गुरु का आदेश था … मै इधर से गुजर रही थी … पेड़ की पत्तियां छूते ही मुझे पता चल गया कि कमरे में कुछ हो रहा है …. उसके इतना बोलने तक मै अपने आपको सम्हाल चुका था …. और फिर आगे बढ़ा और आत्मा की कलाई पर अपने पंजे जकड़ दिए …. लगभग घसीटते हुए उसे झाडियों में से आवास के सामने ले आया जहाँ इतनी रौशनी थी कि गौर से कुछ देखा जा सके … देखा तो पाया कि इस भटकती आत्मा की  उम्र लगभग पच्चीस से तीस साल की रही होगी …. सफ़ेद कुरता पायजामा, गंदे और बिखरे हुए बाल के साथ साथ खड़ी और अच्छी हिंदी में वार्तालाप करती हुई आत्मा के बारे में तय हो चुका था कि ये फिलहाल इंसानी शरीर ही है … उसके बाद मै जो कुछ पूछता उसका ऊल जलूल उत्तर देती … मुझे जाने क्यों झुंझलाहट में क्रोध आया और मैंने झन्नाटेदार एक तमाचा उसके गाल पर रसीद कर दिया (जिन्होंने खाया है वो कहते हैं मेरा एक तमाचा कई मिनट के लिए सुन्न कर देने के लिए काफी होता है) … तमाचा खा कर काफी देर तो उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया… और फिर जब बोली तो कुछ इस दुनिया जैसे अंदाज़ में …. मैंने अब भी उसकी कलाई जोर से पकड़ रखी थी …. कुछ सोच कर उसे रौशनी में देखने के लिए उसे  लगभग दो सौ फिट दूर गैया वाली आंटी के घर के सामने तक ले गया… आंटी बाहर ही सो रही थीं … मेरे बुलाने पर बाहर की लाईट जलाई तो वो भी अचंभित हो गयीं कि रात दो बजे मेरे साथ ये कौन थी … फिर पूछताछ का दौर चला …. आत्मा जी अच्छी खासी हिंदी बोल रही थी … बीच बीच में अंग्रेजी के शब्द… कम्प्युटर वगैरह की भी जानकारी थी उसे  …  नाम भी कुछ अच्छा सा बताया था उसने… इंदौर की रहने वाली थी …. उसने बात चीत के दौरान कई बार आंटी से पूछा कि बताओ इसने मुझे मारा क्यों ?  मैंने इसे छेड़ा था?, या इसे आँख मारी थी, मै तो कम्प्युटर देख रही थी…देखो मेरी पेशाब निकल गयी है …
scary अब स्पष्ट हो चुका था कि उस लड़की का मानसिक संतुलन ठीक नहीं था … यह जान लेने पर मुझे भी अपने ऊपर ग्लानि होने लगी …. उसे समझाने बुझाने का प्रयास भी किया लेकिन वो तो अपनी धुन में थी … मैंने सोचा उसे पुलिस के हवाले कर दूँ …हो सकता है किसी की बेटी हो अपने घर पहुच जाय … लेकिन उसने बताया पुलिस वाले ही तो उसे लाये हैं यहाँ … मेरे लाख कहने के बावजूद आंटी ने मुझे उसे छोड़ने नहीं जाने दिया और खुद ही हाथ पकड़ कर उसे कालोनी के मेन गेट के बाहर छोड़ आईं …
मै घर लौट आया …. पत्नी बच्चे घटना से अनभिज्ञ सो रहे थे … मुझे भी सोचते हुए कब नींद आ गयी पता नहीं… सुबह देर से उठा तो कालोनी और उस से बाहर तक चर्चा फ़ैल गयी थी …. रात मोहल्ले मे चुड़ैल घूम रही थी… किसी ने कहा मेरा दरवाजा खटखटाया… किसी ने कहा मेरे घर प्याज रोटी मांग रही थी … जितने मुँह उतनी तरह की बातें …. पर मुझे अब भी ग्लानि होती है कि किसी की बेटी इस तरह से बेसहारा घूम रही थी… मै प्रयास करता तो शायद उसके घर तक पहुंचा सकता था  ….

हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है

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हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है
जैसे कोई सपना थक कर टूटा लगता है

महल चुने, दीवारें तानी चुन चुन जोड़ा दाना पानी
लाखों रिश्तों में अपनी सूरत ही लगती है अनजानी
कर्तव्यों की कारा में मन का पंछी बिन पंख हो गया
अनजाने अनचाहे पथ पर चलते जाना भी बेमानी
मन उपवन का नकली हर गुल बूटा लगता है
हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है

सोने की दीवारें भी बंदी की पीर न हर पाती हैं
यादों की दस्तक पर, अनजाने आँखें भर आती है
पीछे मुड़ कर देखो तो कल अभी अभी सा लगता है
आगे जीवन के दीपक की बाती चुकती जाती है
आईने का मंजर लूटा लूटा लगता है
हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है

जीने का पाथेय चुकाना होता है हर धड़कन को
साँसे देकर पल पल पाना होता है जीवन धन को
जीना भी व्यापार हुआ पाना है तो देना भी है
जैसे तैसे समझाना पड़ जाता है पागल मन को
ऊपर वाले का भी खेल अनूठा लगता है
हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है
01 अग 2010

आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा –३)


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ब्लॉगिंग केवल आभासी नहीं रह गयी है, इस बात का अनुभव मुझे उसी दिन से हो गया था जिस दिन मैंने अपनी पोस्ट “आज़ाद पुलिस” लिखा… पोस्ट नीरस थी और किसी के व्यक्तिगत
जीवन को प्रभावित नहीं करती थी इस लिए प्रतिक्रियाएँ भले ही कम मिलीं हों .. लेकिन जो भी प्रतिक्रियाएँ मिलीं वो मेरी पोस्ट और लेखन को सार्थक करने के लिए पर्याप्त थी. पोस्ट पढ़ कर यूँ तो कई लोगों की प्रतिक्रियाएँ आईं लेकिन इस सम्बन्ध में श्री जय कुमार झा जी की मेल मुझे लगातार आती रही…उन्होंने बार बार ब्रह्मपाल जी से मिलने की उत्कट इच्छा व्यक्त की … कई बार मोबाइल पर बात चीत होने के बाद दिनांक18/07/2010 को ब्रह्मपाल जी से मुलाकात करने की बात तय हो गयी …झा जी नरेला से आ रहे थे .. तय समय पर मैंने उन्हें आनंद विहार बस अड्डे से लिया और ब्रह्मपाल से मिलने निकल पड़े…  यहाँ मै यह उल्लेख भी करना चाहता हूँ कि श्री जय कुमार झा जी hprd से जुड़े हुए हैं और ईमानदारी और मानवता के प्रति कृतसंकल्प हैं … दिल्ली ब्लॉगर मीट में जो लोग रहे होंगे वो मिल चुके होंगे …  गर्मी इतनी भीषण, कि दोनों ही पसीने से पूरे के पूरे भीग    चुके थे… और आधे घंटे में हम ब्रह्मपाल जी(आज़ाद पुलिस) के पास थे ..
P180710_12.24ब्रह्मपाल जी हमें गली के बाहर ही मिल गए और अपने साथ अपने आशियाने ले गए… आशियाने के नाम पर नंदग्राम के बरात घर का बरामदा था, जहाँ उनका परिवार काफी दिनों से रहता है… बरात घर में घुसते ही आज़ाद पुलिस के पोस्टर बैनर आदि देख कर सहज ही अनुभव होता है कि ब्रह्मपाल जी अपने कार्यों के लिए कितने समर्पित हैं…. बाहर ही बोर्ड लगा था तिरंगा गुटखा राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करता है … जब हम खुले पड़े बरात घर के हाल में पहुंचे तो ब्रह्मपाल जी ने जमीन पर ही चटाई बिछा कर हमारा स्वागत किया (कुल दो प्लास्टिक की कुर्सियों में एक ही की चारों टाँगें सलामत थीं)… चटाई बिछा कर हम दोनों बैठ गए … ब्रह्मपाल जी ने मना करते हुए भी कोल्ड ड्रिंक आदि की व्यवस्था की P180710_11.59_[02]जय कुमार जी ने ब्रह्मपाल जी से उनके बारे में पूछना प्रारम्भ किया… झा जी ने ब्रह्मपाल के पारिवारिक जीवन, उनके संघर्ष से लेकर उनके अंतर्मन तक की थाह ली … जैसे जैसे पूछते गए हमारे सामने टिन के बक्से में से पेपर कटिंग और सरकार को अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के लिए लिए लिखे गए पत्रों, फोटो, और पेपर कटिंग्स का अम्बार लगता गया …कहीं पुलिस की नाकारा व्यवस्था के खिलाफ धरने की बातें, कहीं जिलाधिकारी के आफिस पर ताला जड़ते हुए … कहीं सरकार की नीतियों के विरोध स्वरुप विकास P180710_12.22_[01] के दावे करते पोस्टरों पर कालिख पोतते हुए गिरफ्तारी देते हुए तो कभी पल्स पोलियो की सफलता के लिए अपने रिक्शे सहित स्कूली बच्चों की अगुवाई करते हुए ब्रह्मपाल जी की फोटुओं और पेपर कटिंग्स का अम्बार हमारे सामने था… शिकायत पत्रों की भाषा भले उतनी सटीक न रही हो पर भावना और संकल्प कूट कूट कर दिख रही थी एक एक कटिंग और पत्रों में  और सच कहें तो हमें इतना कुछ देखने सुनने में भी पसीने छूट रहे थे…
P180710_12.01 इसी बीच मोहल्ले के एक सज्जन और आज़ाद पुलिस के सक्रिय सहयोगी श्री मनोज जी (चित्र में सफ़ेद शर्ट में) भी हमसे मिलने आये और अपनी सोच और आगे की योजनाओं के बारे में बात की …आज़ाद पुलिस की सोच यह है कि अगर समाज का हर व्यक्ति समाज के उत्थान के लिए खुद पहल करे तो शायद कोई कारण नहीं कि परिवर्तन न हो कर रहे …. आज पुलिस और प्रशासन बहुत से दबावों के अधीन कार्य करती है … चाहे वो उच्च अधिकारी हो, अथवा नेताओं की जमात हो … इसी को चुनौती देते हुए आज़ाद पुलिस की सोच का उदय होता है … “आज़ाद पुलिस” जो हर इंसान हो सकता है … जो भी अपने सामाजिक परिवेश के प्रति सजग है … उसके सुधार के लिए पहल कर सकता है … वो ही  समाज का रखवाला है… आज़ाद पुलिस है … जिसपर किसी नेता या अधिकारी का दबाव नहीं होता …  “हर वो व्यक्ति आज़ाद पुलिस है जिसमे अपने देश समाज की रक्षा करने का जज्बा और संकल्प हो”
P180710_12.20_[01] जय कुमार झा जी ने मुझे जाते हुए बताया  था कि hprd किसी भी व्यक्ति को अपने स्तर से जांच करने के बाद ही मान्यता देता है इस लिए मुझे ठीक से इस व्यक्ति की मंशा और ईमानदारी  की जांच करनी होगी … और अंततः झा जी ने आश्वस्त होते हुए http://hprdindia.org/ की ओर से ब्रह्मपाल जी को एक प्रशस्ति पत्र और 500/- का अनुदान प्रदान किया … और आश्वासन दिया कि ब्रह्मपाल जैसे लोगों के लिए हम हमेशा कृतसंकल्प हैं और रहेंगे …
P180710_12.24_[01]
ब्रह्मपाल जी हमसे मिल कर बहुत खुश लग रहे थे और बोलते हुए भावुक हो उठे कि पन्द्रह वर्षों में पहली बार आपकी तरह कोई बैठ कर मेरी बातें सुनने आया है मेरे पास … बीच में कई लोग जुड़े भी लेकिन खोखले आश्वासन के अलावा आजतक कुछ नहीं मिला कभी … अब मुझे कुछ मिले न मिले लेकिन इतना तो संतोष है कि मेरी बात किसी के कानों तक पहुंची तो सही ….अभी तो बहुत कुछ और बताने और दिखाने को था आज़ाद पुलिस के पास …हजारों पत्रों की प्रति और रिक्शा चला कर कमाए हुए पैसे से सैकड़ों रजिस्ट्रियों की रसीद  देख कर कोई इस इंसान को जुनूनी ही कहेगा… चिट्ठियों और पेपर कटिंग्स से भरी दूसरी गठरी खोलने से पहले ही हमने उन्हें मना कर दिया और आगे भी  मिलते जुलते रहने का आश्वासन दिया …
P180710_12.23_[01] हम लोगों ने आगे की योजनाओं के बारे में भी बहुत सी बातें कीं… कि किस तरह से कौन से मुद्दे पर किस स्तर का संघर्ष किया जाए … समाज के सीधे सादे और ईमानदार लोगों पर अत्याचार और अन्याय के लिए लड़ाई में धार कैसे लाई जा सकती है … हर संघर्ष के लिए धन की जरूरत होती है … इसके लिए जनता के सहयोग से एक फंड की स्थापना की जरूरत पर भी विचार किया गया जिस से पुलिस और प्रशासन से परेशान सीधे सादे लोगों का यथा योग्य सहयोग किया जा सके …
P180710_12.25 जय कुमार झा जी के साथ आज़ाद पुलिस से मुलाक़ात करना बहुत सुखद रहा … हम दोनों पसीने से भीग चुके थे …  हमने ब्रह्मपाल जी के साथ एक फोटो खिंचवाने और भविष्य में अन्य सकारात्मक संघर्षों में साथ रहने के आश्वासन के बाद विदा ली .. जाते जाते ब्रह्मपाल जी के आग्रह पर तीनों ने एक साथ फोटो भी खिंचवाई ..
इतनी भीषण गर्मी के बावजूद  ब्रह्मपाल के पास एक अदद टेबल फैन तक नहीं था … अन्य किसी सुविधा की क्या बात करना … जमीन पर सोना, अपने दो बेटों और पत्नी के साथ …. एक अदद रिक्शा ही जीविका और संघर्ष दोनों के लिए आर्थिक श्रोत है … अन्य कहीं से कोई सहायता नहीं मिली कभी … हाँ अगर कुछ है ब्रह्मपाल जी के पास तो वो है भ्रष्टाचार और शासन की लापरवाही के विरूद्ध लोहा लेने की उत्कट इच्छा शक्ति और परमार्थ कुछ कर गुजरने का जूनून …
P180710_12.20_[02]आम इंसान के हित में किसी भी प्रकार के सहयोग के लिए ब्रह्मपाल के नम्बर 09654829179  या मेरे नम्बर –9716973262 पर संपर्क कर सकते हैं …
किसी भी तरह के सहयोग के सम्बन्ध में इस पर मेल करना न भूलें …
azadpolice@gmail.com

आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा-२)

गतांक से आगे –
निर्दोष ब्रह्मपाल लखनऊ की आठ महीने पन्द्रह दिन की जेल काट कर आया तो उसका मन प्रशासन और पुलिस के भ्रष्टाचार के प्रति विरक्ति से भर गया था… जेल मे रह कर उसने जो कुछ भी देखा सुना उसने उसे पुलिस के प्रति मानसिक रूप से विद्रोही बना दिया… लेकिन एक गरीब कर भी क्या सकता था … बूढ़ी माँ की जिद पर उसने ब्रह्मवती से विवाह कर लिया. और आजीविका के लिए मजदूरी करने लगा… मजदूरी कर के कुछ पैसे जुटाए और अपने लिए एक रिक्शा ले लिया और परिवार सहित हापुड कोतवाली मे डेरा डाल दिया … वहाँ भी इसने अपने साथ हुए अत्याचार के लिए न्याय मांगने के लिए जद्दोज़हद करता रहा… लेकिन उसे कभी दुत्कार तो कभी पुलिस हवालात तो कभी लात घूंसे भी खाने पड़े …  न्याय पाने के लिए उसने जिलाधिकारी,पुलिस अधीक्षक से लेकर मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक के सामने अपनी बात रखी लेकिन न् तो मामले की जाँच हुई और न् ही कोई कार्यवाही हुई… दूसरी क्लास तक पढाई करने के बावजूद ब्रह्मपाल मे लेखन की प्रतिभा और समाज के प्रति समर्पण की भावना कूट कूट कर भरी होने के कारण उसने पुलिस की कार्य प्रणाली के सम्बन्ध मे अधिकारियों को हजारों पत्र लिखे…लेकिन कोई हल नहीं निकला … आज वो अपने साथ हुए अन्याय की उम्मीद छोड़ चुका है… आज उसकी एक ही मांग है कि प्रशासन को लिखे गए उसके सारे पत्र वापस कर दिए जाएँ …

लचर पुलिस व्यवस्था के विरूद्ध  संघर्ष -

अपने साथ हुए अत्याचार का कोई न्याय मिलते न देख ब्रह्मपाल ने पुलिस  प्रशासन के प्रति विरोध का अनूठा तरीका अपना लिया … रिक्शा ही उसकी आजीविका का एक मात्र साधन था… उसने एक दिन खुद ही पुलिस की वर्दी पहन ली … और रिक्शे पर आज़ाद पुलिस के बोर्ड लगा लिए… अपने आपको आज़ाद पुलिस के रूप मे इस लिए बदल लिया कि इस पुलिस के पास नेताओं या अधिकारियों का कोई दबाव नहीं है ..आज़ाद पुलिस भ्रष्टाचार के प्रति बिना किसी लाग लपेट के लड़ाई जारी रखेगी … उसने रिक्शा चलाते हुए भी पुलिस का वेश धारण कर लिया और अपने कमाए पैसों से चालान बुक छपवा ली …
अब उसका मिशन है कि रिक्शा चलाते हुए जहाँ भी पुलिस के लोगों को अपनी ड्यूटी से दूर खड़े होते, नशे मे ड्यूटी करते, रिश्वत लेते,या बिना टोपी डंडे के ड्यूटी देते देखता है तुरंत रुक कर पुलिस वाले का चालान काट देता है … और चालान पर नाम सहित कमियों के उल्लेख करने के साथ साथ उस पुलिस वाले से चालान पर हस्ताक्षर भी ले लेता है … हस्ताक्षर न देने पर बवाल खड़ा कर देता है…
जिससे फजीहत के डर से पुलिस वाला हस्ताक्षर कर अपना पिंड छुड़ाता है … और ये चालान एक दो दिन मे एस एस पी आफिस मे बाकायदा कार्यवाही की प्रार्थना के साथ जमा करवा दिया जाता है … ऐसे मे भले पुलिस वाले पर कोई गंभीर कार्यवाही भले न हो लेकिन उसकी फजीहत होना तय  है …  और इसी लिए पुलिस वाले भी उसको देखते ही “राईट-टाइट” हो जाते हैं … जिस पुलिस वाले ने हेलमेट न पहना हो, जिसकी गाड़ी के प्रपत्र पूरे न होँ, या  तिहरी सवारी कर रहे होँ उनका चालान कटना तय है …
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उसका मिशन है कि जिस भ्रष्टाचार और अत्याचार का वो शिकार हुआ है…उसका शिकार कोई और गरीब न हो  इसके लिए उसका यथा-शक्ति संघर्ष लगातार चलता रहता है …
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जहाँ भी उसे लगता है कि व्यवस्था मे कुछ गलत हो रहा है उसके बारे मे प्रशासन को सचेत करने के लिए चिट्ठियाँ लिखना … सरकार की नीतियों के खिलाफ विकास के झूठे साइन बोर्डों पर कालिख पोतना, और अपने तरीके से विरोध दर्ज करवाना उसका रोज़ का काम है … इस सब के कारण अक्सर हवालात की हवा खाता रहता है …. कई बार तो बुरी तरह पीटा भी जाता है…इसी क्रम मे कुछ दिन पहले गाज़ियाबाद कलेक्ट्रेट मे मुख्यमंत्री के विकास सम्बन्धी दावों वाले पोस्टरों पर कालिख पोतने के जुर्म मे कविनगर पुलिस द्वारा अपराध संख्या 371/2010 के अंतर्गत जेल मे निरुद्ध किया गया और उसका रिक्शा भी थाने मे बंद कर दिया गया था जहाँ से अभी कुछ दिन पहले छूट कर आया है….
काफी मशक्कत के बाद रिक्शा भी छूट गया है… और पूर्व की भांति उसका संघर्ष अनवरत चल रहा है … यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ब्रह्मपाल मे न्याय न् मिलने से निराशा अवश्य है लेकिन उसका जूनून आज भी वही है … फर्क सिर्फ इतना है कि पहले उसकी लड़ाई अपने लिए थी और आज वो गरीब जनता के लिए संघर्ष कर रहा है ….

तिरंगा का अपमान -

पिछले काफी समय से “तिरंगा” ब्राण्ड के एक गुटखा कंपनी के विरुद्ध संघर्ष कर रहा है… इसके अनुसार किसी ऐसी चीज़ का नाम तिरंगा होना… या इस पर तिरंगा छापना राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का अपमान है… इस सम्बन्ध मे नगर मजिस्ट्रेट गाज़ियाबाद द्वारा उसके प्रार्थना पत्र के आधार पर पुलिस अधीक्षक गाज़ियाबाद को उक्त के सन्दर्भ मे गुटखा कंपनी के विरुद्ध नियमानुसार कार्यवाही करने के निर्देश दिए गए हैं (कैम्प/एस टी -सी एम/०९ दिनांक २९-०९-२००९) लेकिन न् तो अभी इसकी जाँच पूरी हुई है और न् ही गुटखा कंपनी के विरूद्ध कोई कार्यवाही की गयी है.

और कारवाँ बनता गया

शुरुआत मे जब ब्रह्मपाल इस तरह के विरोध के कार्य करता तो पुलिस के लोग और अधिकारी उसे सरफिरा कह कर या “मानसिक संतुलन ठीक नहीं है” कह कर टाल देते थे… लेकिन धीरे धीरे लोगों और पत्रकारों की उत्सुकता का केन्द्र बनता गया और ब्रह्मपाल के बारे मे ख़बरें छपने लगीं … इससे उसे जानने वालों मे इजाफा हुआ और कुछ समाज सेवी लोग ब्रह्मपाल से मिले और इसके अभियान मे साथ देने की इच्छा प्रकट की …इस तरह ब्रह्मपाल ने स्थानीय लोगों की मदद से “आज़ाद पुलिस वेलफेयर समिति” का गठन किया गया जिसका संस्थापक ब्रह्मपाल को  और अध्यक्ष श्री बी.एस.गौतम को बनाया गया …

आज़ाद पुलिस वेलफेयर समिति -

आज़ाद पुलिस वेलफेयर समिति बन जाने से ब्रह्मपाल को लोगों का समर्थन और अधिक मिलने लगा …उक्त समिति के तत्वाधान मे बहुत से सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किये गए और किये जाते हैं  …इस समिति के माध्यम से दो अनाथ और  गरीब लड़कियों का विवाह करवाया गया … प्रति वर्ष सावन माह मे कांवड के मेले मे इस समिति के माध्यम से कांवडियों के लिए मुफ्त भंडारे का आयोजन किया जाता है …वृक्षारोपण के कार्य करवाए गए जिसका उदघाटन स्वयं सिटी मजिस्ट्रेट ने अपने हाथों से किया …..इसके अतिरिक्त पल्स पोलियो जैसे सरकारी
कार्यक्रमों को भी  सफल बनाने के लिए रैलियाँ निकाली गयीं जिसके पीछे ब्रह्मपाल का जूनून और अथक संघर्ष रहा है … इसके अतिरिक्त गुजरात मे आये भूकम्प पीड़ितों के लिए अथक परिश्रम कर के चंदा इकठ्ठा किया गया और गुजरात भेजा गया…. इसके अतिरिक्त और भी बहुत से कार्य समय समय पर किये जाते रहते हैं… इस सम्बन्ध मे ब्रह्मपाल का कहना है कि जब लोग बुराई का दामन नहीं छोड़ते तो मै अच्छाई का दामन कैसे छोड़ दूँ … लोग कहते हैं क्रम ही पूजा है… लेकिन ब्रह्मपाल का कहना है कर्म तो बुरे भी हो सकते हैं इस लिए “सत्कर्म ही पूजा है” सब से पहले सत्कर्मों की शुरुआत अपने आप से करो … फिर किसी से इसकी अपेक्षा करो… समिति ने पुलिस की छवि सुधारने के लिए राज्य के 70 जिलों के जिलाधिकार्यों को पत्र लिखा है और आवश्यक सलाह दी है … देखना है कि प्रशासन इसे कितनी गंभीरता से लेती है ब्रह्मपाल को सामाजिक कार्यों के लिए कई बार आंबेडकर जन्मोत्सव समिति द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है … आज जब कि वह प्रशासन से नाराज़ है , उसने पिछले पन्द्रह सालों मे प्रशासन को लिखे गए अपने पत्रों को वापस माँगा है …
उल्लेखनीय है कि समाज के बारे मे ऐसी बातें करने वाले ब्रह्मपाल के पास सर छुपाने की भी जगह नहीं है और खुले आसमान के नीचे ही अपना आशियाना बना रखा है… परिवार के नाम पर ब्रह्मपाल की पत्नी और दो बेटे हैं … जिन्हें कभी किसी बरामदे मे तो कभी खुले आसमान के नीचे ले कर रहता है … दिन भर रिक्शा चलाना और इसी कमाई से समाज सेवा करना कितना कष्टसाध्य कार्य है इसे एसी मे बैठे अफसरशाह कैसे और क्यों समझेंगे … लोक सेवक हमारी प्रशासनिक व्यवस्था के आधार स्तंभ हैं … लेकिन भ्रष्टाचार के दलदल मे इस कदर डूबे हैं कि उन्हें स्वार्थ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखाई देता है … अगर कोई अपवाद आता भी है तो धीरे धीरे इसी भ्रष्टाचार रुपी सागर मे समा जाता है … अगर कोई बच भी गया तो स्थानांतरण आदेश की प्रति हमेशा उसका पीछा करती रहती है … ऐसे मे ब्रह्मपाल जैसा जज़्बा एक आम आदमी के लिए सीख से कम नहीं है… उसका कहना है कि कामयाबी अपनी जगह है और प्रयास करना अपनी जगह … जीते जी मेरा प्रयास चलता रहेगा … १९८८ से अकेला प्रशासन से लड़ जाने वाला यह शख्स प्रधानमन्त्री,लखनऊ सचिवालय,जिलाधिकारी, पुलिस अधिकारी से लेकर राष्ट्रपति तक अकेला संघर्ष कर चुका है .. और आज भी अपने जज्बे पर कायम है …
ब्रह्मपाल का वर्मान पता :
ब्रह्मपाल सिंह
लेखक : आज़ाद पुलिस
बरात घर, खुले आसमान के नीचे
नन्द ग्राम गाज़ियाबाद … फोन :9811394513 (PP)
और अन्त मे …… ब्रह्मपाल के दस्तावेज़ और संघर्ष की कहानी की ये बानगी भर है … बहुत संक्षिप्त और मूल मूल बातें लिखते हुए दो पोस्टें भर गयी हैं …पाठकों के समर्थन पर थोड़ा और प्रकाश डालना चाहूँगा ब्रह्मप्रकाश की व्यथा पर … पद्म सिंह




आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा -१)

आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा -१)

11 जुला 2010
P100710_10.16_[03]पिछले दस वर्षों से आते जाते देखा है उसे …पुलिस वाले उसे देखते ही अपनी ड्यूटी पर सचेत हो जाते हैं …. खाली सर वाले पुलिस वाले तुरंत सिर पर टोपी पहन लेते हैं … और रिश्वत लेते हाथ  इसे देखते ही यकायक रुक जाते हैं … कृषकाय… साधारण सा दिखने वाला   इंसान…. खाकी वर्दी, सर पर पुलिस की टोपी… और हाथ मे पुलिस जैसा ही डंडा लिए हुए वो अपना पुराना सा रिक्शा खींचते हुए… शहर मे कहीं भी कभी भी दिखाई दे जाता है…. यूँ तो कोई विशेष बात नहीं लगती  है इसमें  .. लेकिन एक बात और होती है जो बरबस लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करती है…. उसके  रिक्शे के आगे पीछे हर जगह “आज़ाद पुलिस” लिखा हुआ है … रिक्शे के पीछे  भी “आजाद पुलिस” और “हम बदलेंगे जग बदलेगा” और “भ्रष्टाचार के  खिलाफ” “अंधा क़ानून”  जैसे स्लोगन लिखे हुए होते हैं …वो चलाता तो रिक्शा है लेकिन अपने आपको आज़ाद पुलिस कहता है.. पल्स पोलियो, दहेज विरोध तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ बैनर लगा कर लोगों को जागृत करने वाले इस व्यक्ति के बारे मे कई बार उत्सुकता हुई कि यह कौन है … यह आजाद पुलिस क्या है ? कौन है वह व्यक्ति जो अपने  आप को आजाद पुलिस कहता है ?आखिर क्यों धूमता है वो अपनी रिक्शे पर आजाद पुलिस का बोर्ड लगा P100710_10.16कर ? आज सुबह अचानक जब उसका रिक्शा सामने से गुज़रा तो मुझसे रहा नही गया और मैंने उसकी वास्तविकता जानने का मन बना लिया …
रिक्शा किनारे लगवा कर मैंने जब अपनी उत्सुकता उसके सामने रखी तो उसने अपने बारे मे जो कुछ बताया वो सुन और देख कर मै हतप्रभ रह गया …. जब मैंने उससे उसके बारे मे पूछा तो उसने कहा भाई साहब मै   तो लेखक हूँ… मैंने अपना जीवन न्याय के लिए संघर्ष और गरीबी मे काट दिया है……लेकिन आज तक मुझे प्रशासन या न्याय व्यवस्था से न्याय नहीं मिल सका है … पिछले पन्द्रह सालों से मै प्रशासन के लचर रवैये और दमनात्मक नीतियों का जीता जागता उदाहरण हूँP100710_10.16_[02]… सरकार की कोई भी नीति गरीबों और लाचारों तक न् पहुँच पाने का कारण है प्रशासन का लचर और गैर जिम्मेदाराना रवैया … उत्सुकतावश उसके बारे मे मैंने कुछ और जानने की नीयत से उसके जीवन के बारे मे पुछा … तो उसने अपनी कहानी प्रमाणों के साथ(जो उसके रिक्शे मे ही गद्दी के नीचे रखे थे) एक एक कर मेरे हाथ पर रख दिए . इसने अपने बारे मे जो कुछ बताया उसे आगे लिखता हूँ .
बात चीत मे शिष्ट और प्रवाहमयी व्यावहारिक बातें करने वाले इस व्यक्ति ने अपना नाम ब्रह्मपाल प्रजापति बताया… सात भाइयों और एक बहन के बीच ब्रह्मपाल का गरीबी ने बचपन से ही साथ नहीं छोड़ा… बचपन मे पढ़ने की इच्छा रखने वाले ब्रह्मपाल गरीबी के कारण केवल दूसरी कक्षा तक ही पढ़ सके बारह वर्ष की कच्ची उम्र मे परिवार के भरण पोषण का जिम्मा ब्रह्मपाल पर होने के कारण चाय की दूकान पर नौकरी करनी पड़ी … खेलने कूदने और पढ़ने की उम्र मे इनके सामने परिवार की दो जून की रोटी का ही लक्ष्य था … लेकिन स्कूल छोड़ने की टीस हमेशा चुभती रही … स्वाभिमान ब्रह्मपाल के स्वभाव मे कूट कूट कर भरा था.. यही कारण था कि वो चाय की दूकान पर नौकरी अधिक दिन न् कर सका और मालिक की गाली गलौच से परेशान हो कर दिल्ली आ गया जहाँ उसने अथक मेहनत कर के कुछ रूपये जोड़ लिए … अपनी दमित इच्छाओं के वशीभूत ब्रह्मपाल ने जीविकोपार्जन के लिए बम्बई का रुख किया और मेहनत करते हुए परिवार को पैसे भेजता रहा …
कुछ सालों बाद परिवार वालों की जिद पर जब ब्रह्मपाल अपने गाँव वापस आया तो फिर बम्बई नहीं गया और परचून की दूकान खोल ली … इसी बीच अपनी नैसर्गिक प्रतिभा के वशीभूत ब्रह्मपाल ने  कक्षा दो तक की शिक्षा के बावजूद भी अनेक कविताओं और लघु उपन्यासों की रचना की . उसकी इच्छा थी कि उसके उपन्यास पर अगर कोई फिल्म बना दे तो उसकी गरीबी दूर हो जाय.
इसी बीच ब्रह्मपाल का परिचय हापुड़ निवासी एक व्यक्ति शम्भूनाथ शर्मा से हुआ … शम्भूनाथ शर्मा ने जब उसका उपन्यास पढ़ा और लालच दिया कि यदि तुम आठ हजार रुपये का इन्जाम करो तो तुम्हारी उपन्यास पर फिल्म बनवा दूँगा … मेरे जानने वाले बहुत से लोग फिल्म इंडस्ट्री मे हैं …फिर तुम्हें लोग “गम के आँसू” के लेखक के रूप मे जानेंगे …. घर की माली हालत खराब होने के बावजूद ब्रह्मपाल ने आठ हजार रुपयों का इंतजाम किया और कहानी सहित शम्भूनाथ को दे दिया …शम्भूनाथ ने वो कहानी अपनी कह कर किसी प्रोड्यूसर को बेच दी …और ब्रह्मपाल को दुत्कार कर भगा दिया …  इस कहानी पर फिल्म भी बनी…  ब्रह्मपाल का अब तक का जीवन दुःख और संघर्षों से घिरा रहा…. लेकिन यहाँ से उसके संघर्षों का दूसरा अध्याय प्रारंभ होने वाला था…
शेष आगे .........

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी


क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी

संघर्षों का फल लाएगी

 

स्वप्न बंधे जंजीरों में

आशाएं कुंठित रुद्ध भले होँ

आज समय विपरीत सही

विधि के निर्माता क्रुद्ध भले होँ

स्वेद लिखेगा आने वाले

कल को बाज़ी किसकी होगी

झंझावात रुके हैं किससे

राहें होँ अवरुद्ध, भले होँ

जाग पड़ेंगे सुप्त भाग्य

कुछ ऐसा कोलाहल लाएगी

क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी

संघर्षो का फल लाएगी ...

 

हमने सीखा नहीं समय से

डर जाना घुट कर मर जाना

क्रान्ति और संघर्ष रहा है

परिवर्तन का ताना बाना

दुर्दिन के खूनी पंजों से

खेंच सुपल फिर वापस लाना

ठान लिया तो ठान लिया

पाना  है या कट कर मर जाना

थर्रायेंगे दिल दुश्मन के

वो भीषण हलचल लाएगी

क्रांति सुनहरा कल लाएगी

संघर्षों का फल लाएगी….

 

याचक बन कर जीना कैसा

घुट घुट आंसू पीना कैसा

रोशन होकर ही जीना है

धुवाँ धुवाँ कर जीना कैसा 

घात लगा कर गलियों गलियों

गद्दारों की फ़ौज खड़ी है

तूफानों  से घबरा जाए

वो भी कहो सफीना कैसा

हर पगडण्डी राजमार्ग तक

आज नहीं तो कल लाएगी

क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी

संघर्षों का फल लाएगी ….

रविवार, 20 जून 2010

इक नज़र का नशा मुकम्मल यूँ





बिन तुम्हारे भी क्या किया जाए
अब मरा जाए या जिया जाए 


लुट गया सब न कुछ रहा बाकी
लुत्फ़-ए-आवारगी लिया जाए 


इस से बेहतर कि शिकायत रोएँ
चाक दामन न क्यों सिया जाए 


इक नज़र का नशा मुकम्मल यूँ
उम्र भर मय न फिर पिया जाए 


इश्क है आज दिमागों का शगल
यूँ न हो ‘दिल’ से हाशिया जाए 


अब तो नेज़ा-ए-इश्क पे सर है
जिस्म अब जाए जाँ कि या जाए 


अजब गज़ल है जिंदगी की भी
रुक्न साधूँ तो काफिया जाए



छुट्टियों नेट से दूर होने के कारण एक लंबे अघोषित अंतराल के बाद ब्लॉग पर अपनी सक्रियता पुनः प्रारम्भ करता हूँ .... छुट्टियों में अपने जन्मस्थान या 'मुलुक' जाने का उत्साह और लोभ हमेशा उधर को खींचता है ... लेकिन अपने जन्मस्थान से काफी दूर होने के कारण वर्ष में एक दो बार ही प्रतापगढ़ जाना हो पाता है ... इधर लखनऊ में भांजेकी सगाई का समाचार मिलते ही हमें लगा कि मौका भी है दस्तूर भी ... इसी बहाने लखनऊ होते हुए प्रतापगढ़ भी कुछ दिन रह लेंगे ... हर बार की तरह इस बार भी सब की प्लानिंग यही थी कि कार से गाज़ियाबाद से लखनऊ और फिर प्रतापगढ़ तक का सफर किया जाय .बच्चों का तर्क है कि कार से लोंग ड्राइव के मज़े भी मिल जायेंगे और इसमें जहाँ भी मन हो रुक कर खाते पीते जाया जा सकता है ... लेकिन मेरे पूर्व के अनुभव बताते हैं कि कार से हर लॉन्ग ड्राइव का मज़ा मुझे अकेले ही लेनापड़ता है .. क्योकि ड्राइव पर हम जब भी निकले होते हैं... पन्द्रह बीस किलोमीटर के बाद कार की आगोश में मै ही मिलता हूँ.. शेष सभी नींद की आगोश में जा चुके होते हैं ... और तब तक सोते रहते हैं जब तक कि गंतव्य न आ जाय ... और तो और लगभग पांच सौ किलोमीटर की लंबी यात्रा के दौरान कई बार तो मुझे भी झपकी आ जाती .. और एक सेकेण्ड को कार दायें या बाएं झूल जाती ... और ऐसा लगभग हर बार होता ... इस लिए इस बार फैसला किया कि हमें कार से न चलकर ट्रेन की सुकूनदायकयात्रा करनी चाहिए ... थोड़ी मुश्किल लेकिन बेहद सुकून के साथ लखनऊ पहुँच गए .. लेकिन गर्मी ने अपने पलक/फलक पांवड़े बिछा रखे थे .. या कहिये मोर्चेबंदी कर रखी थी ...तीन दिन के लखनऊ प्रवास के दौरान मै व्यस्तता के चलते चाह कर भी अपने ब्लोगर बंधु(छोटा भईया) राजीव नंदन द्विवेदी और माननीय सरवत जमाल साहब से मुलाक़ात नहीं कर सका और प्रतापगढ़ चला गया ... प्रतापगढ़ में विद्युत और सड़कों की ऐसी व्यवस्था देख आँखें चुंधिया गयीं... चुन्धियाना वाजिब भी था क्योकि जब दिन में चौबीस घंटे में अट्ठारह घंटे (के बाद) बिजली आती तो आँखें चुंधिया जाती... सौर ऊर्जा से एक छोटा पंखा चलता जो ऊंट के मुहं में जीरे का काम करता .... दिन भर की प्रचंड गर्मी के बाद रात को अगर हवा चल जाती... तब तो रात किसी तरह पार हो जाती लेकिन ऐसा चंद दिनों हुआ ... आठ दस दिन बाद एक दिन की आंधी ने मेरे घर की ओर आने वाले कई विद्युत स्तंभ धराशाई कर के रही सही कसर भी पूरी कर दी ... गर्मी से बचने का एक ही उपाय था घर से घूमने निकल जाओ ... इस लिए अपने छोटे भाई के स्कूल की वैन से रोज़ कहीं न कहीं घूमने का प्लान बनता और निकल जाते घूमने ... इसी बीच एक शाम अविनाश वाचस्पति जी का फोन आया कि ललित शर्मा जी दिल्ली की शोभा बढा रहे हैं और आप कहाँ है ...मैंने शर्मा जी, और राजीव तनेजा जी से अपनी मजबूरी बताई और क्षमा प्रार्थना भी की ...मेरी दूरी और मजबूरी दोनों को ध्यान में रखते हुए मुझे छूट दे दी गयी.... चंद दिनों में वापस गाज़ियाबाद आ गया ....घर से मेरे बड़े भैया अपनी इंडिका से लखनऊ के लिए निकले थे ... कुछ समय बाद फोन आया कि दोपहर की धूप
में ए सी चला कर सफर करते समय उन्हें झपकी आ गयी और चलते हुए ट्रक में पीछे से टक्कर मार दी है ... शुक्र है कि गाड़ी के नुक्सान के अलावा कोई  शारीरिक क्षति नहीं हुई क्योकि ट्रक आगे को जा रहा था .. . अफ़सोस करते हुए हम ट्रेन पर बैठे और वापस आ गए .. अब आप सोचेंगे खा म खा इत्ती कहानी बताई इस से क्या फायदा ... टेम खराब किया ... तो इस कहानी से सीख ये मिलती है कि
१- ब्लॉग से बिना बताए कुछ दिन के लिए खिसक लेने में कोई हर्ज नहीं
२- ज्यादा लंबा सफर अगर कार से करना हो तो प्रोफेशनल ड्राइवर को साथ ले
लें या दो लोग चलाने वाले होँ
३ -सफर रात का अच्छा होता है लेकिन करीब दो बजे से सुबह तीन बजे के बीच
एक बार नींद ज़बरदस्त आती है ... ऐसे में कहीं रुक कर झपकी ले लेना ठीक
होता है
४ -अगर ट्रक में टक्कर मारनी हो तो पीछे से मारें और चलती ट्रक में ही ...
५ -लंबे सफर के लिए कार का चुनाव विशेष परिस्थितियों में ही करें
६ -किसी शहर में जाएँ तो कितनी भी व्यस्तता हो ... ब्लॉगर खोजें और
मेहमान नवाजी का लुत्फ़ ज़रूर उठायें ...(वरना वापस आ कर झूठ मूठ का बहाना बनाना पड़ेगा)
७ -गरमी के मौसम में प्रतापगढ़ जैसे हिल (हिला देने वाले) स्टेशन पर जाने से बचें ..