शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

मत लेना विश्राम

उठो पुनः हुंकार भरो करना है प्रभु का काम
जब तक समर शेष है साथी मत लेना विश्राम

सदियों के संघर्षों बलिदानों से तृषा  छँटी है।
अरुणाई की आहट है पौ देखो वहाँ फ़टी है।
भारत माता पुनः हमारा करती है आह्वान 
जब तक समर शेष है साथी मत लेना विश्राम

राजा दाहिर, वीर शिवाजी राणा को तर्पण है
भारत माता की रक्षा में शीश सदा अर्पण है 
स्वाभिमान की रक्षा में हँस कर आ जाना काम 
जब तक समर शेष है साथी मत लेना विश्राम

पुरखों ने बलिदान दिया और तप कर पुण्य कमाया
सदियों का संघर्ष कि जिसने मन्दिर भव्य बनाया
धर्म ध्वजा ले बढ़ते जाना लेना नहीं विराम 
जब तक समर शेष है साथी मत लेना विश्राम।

भान करो अर्जुन हो फिर अपनी गांडीव उठाओ
शेष तिमिर को चीर राष्ट्र को हिन्दू राष्ट्र बनाओ 
कानों में  घण्टों की ध्वनि हो मुँह में प्रभु का नाम
जब तक समर शेष है साथी मत लेना विश्राम।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

धीरे धीरे छूट रहा हूं

अन्दर अन्दर टूट रहा हूँ
धीरे-धीरे छूट रहा हूँ ।

सच्चा केवल अन्तर्मन है
बाहर बाहर झूठ रहा हूँ ।

रामबाण औषधि हूँ वैसे
यद्यपि कड़वा घूट रहा हूँ।

जीना कुछ आसान नहीं था
पत्थर कोपल फूट रहा हूँ।

 दोष किसे दूँ लुट जाने का,
मैं ही खुद को लूट रहा हूँ।

परत दर परत उतर रहा हूँ
जैसे  जैसे कूट रहा हूँ।


पद्म सिंह 07.09.2026

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी


क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी
संघर्षों का फल लाएगी

स्वप्न बंधे जंजीरों में
आशाएं कुंठित रुद्ध भले होँ
आज समय विपरीत सही
विधि के निर्माता क्रुद्ध भले होँ
स्वेद लिखेगा आने वाले
कल को बाज़ी किसकी होगी
झंझावात रुके हैं किससे
राहें होँ अवरुद्ध, भले होँ
जाग पड़ेंगे सुप्त भाग्य
कुछ ऐसा कोलाहल लाएगी
क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी
संघर्षो का फल लाएगी …

हमने सीखा नहीं समय से
डर जाना घुट कर मर जाना
क्रान्ति और संघर्ष रहा है
परिवर्तन का ताना बाना
दुर्दिन के खूनी पंजों से
खेंच सुपल फिर वापस लाना
ठान लिया तो ठान लिया
पाना है या कट कर मर जाना
थर्रायेंगे दिल दुश्मन के
वो भीषण हलचल लाएगी
क्रांति सुनहरा कल लाएगी
संघर्षों का फल लाएगी….

याचक बन कर जीना कैसा
घुट घुट आंसू पीना कैसा
रोशन होकर ही जीना है
धुवाँ धुवाँ कर जीना कैसा
घात लगा कर गलियों गलियों
गद्दारों की फ़ौज खड़ी है
तूफानों से घबरा जाए
वो भी कहो सफीना कैसा
हर पगडण्डी राजमार्ग तक
आज नहीं तो कल लाएगी
क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी
संघर्षों का फल लाएगी ….

(C) पद्म सिंह 

जीत पाया नहीं किन्तु हारा नहीं

तुम मेरे ना हुए ना मिले ना सही 
अब भी दिल पर मेरे हक हमारा नहीं
गाँव माज़ी  में कोई घरौंदा तो है
जिस को सपनों ने बेशक सँवारा नहीं 

गिर गयी रात की आख़िरी पाँखुरी
और उफ़क पर भी कोई सितारा नहीं 
आखरी साँस है मेरी आवाज़ की 
फिर न कहना के हमने पुकारा नहीं 

एक दिया टिमटिमाता रहा रात भर 
एक दस्तक की उम्मीद जागी रही  
एक कतरा  न टूटा मेरी आँख से 
एक लम्हा तेरे बिन गुज़ारा नहीं 

यूँ तो हर फ़ूल का एक अंजाम है
खिल के महका महक कर के खुद गिर गया 
तुम कली तोड़ कर घाव क्यों दे गए 
वक्त का तुमने समझा इशारा नहीं 

शर्त बस एक थी मैं तुम्हारा रहूँ
मेरा कुछ ना रहे सब तुम्हारा रहूँ 
ना मिरा मैं रहा ना तुम्हारा हुआ 
हाय डूबा के मिलता किनारा नहीं। 

ज़िन्दगी का फ़साना भला या बुरा 
सुर में सुर बिन मिलाए गुज़ारा नहीं 
दिल लुभाती हैं  लहरों की अठखेलियाँ
कूद जाओ तो मिलता किनारा नहीं 

ज़िन्दगी जंग है रंग ए महफ़िल भी है
वही मजधार है और साहिल भी है 
हौसलों के मुसलसल हुए इम्तहाँ
जीत पाया नहीं किन्तु हारा नहीं

(C) पद्म सिंह 28.02.2017

सुबह हो गयी कौवा बोला लल्ला ने कंप्यूटर खोला

सुबह हो गयी कौवा बोला 
लल्ला ने कंप्यूटर खोला

आँखें मींचे ऊपर नीचे 
फेसबुकी संदेश निहारे 
हाय हैलो की टेर लगाई
गुड मॉर्निंग के चस्पे मारे
मैसेज वाला बॉक्स टटोला 
सुबह हो गयी कौवा बोला

अनगढ़ सा इक शेर निकाला 
इधर उधर की फोटू डाला 
चाय लिखा, नमकीन दिखाई 
सुबह सुबह की सैर बताई 
अखबारों से ख़बर उड़ाई 
उसे बना स्टेटस ठेला 
सुबह हो गयी कौवा बोला

सुन्दर सुन्दर मुखड़े छांटे 
बड्डे बड्डे हैप्पी बाँटे
छाँट छाँट रिक्वेस्ट सहेजा 
बेस्ट फ्रेंड को मैसेज भेजा 
फिर मैडम को कुहनी मारी 
बेट्टी तो लाओ मुँह खोला 
सुबह हो गयी कौवा बोला

पाँच टिप्पणी पंद्रह लाइक
मन प्रसन्न स्टेटस टाइट 
क्रान्ति शान्ति समझा आए हैं 
सबको नीति बता आए हैं 
जितना ज्ञान बचा रक्खा था 
सबको बाँटा तोला तोला 
सुबह हो गयी कौवा बोला…

मैडम ने जब झिड़क लगाई 
तब धरती पर लौटे भाई 
ड्यूटी का टाइम हो आया 
आधा धोया जरा नहाया 
बस के पीछे पीछे भागे 
थामे हाथ टिफ़िन का झोला 
सुबह हो गयी कौवा बोला 
लल्ला ने कंप्यूटर खोला।

(निर्मल हास्य) …. पद्म सिंह

बुधवार, 15 जुलाई 2026

जीवन इक दरिया है, रेत समुन्दर की

प्यार नहीं है बैठ किनारे रह जाना
कूदे जो मजधार, धार में बह जाना ।

ज़ुल्म नहीं है मात्र जुल्म करते रहना
बड़ा जुल्म चुपचाप जुल्म को सह जाना ।

चुप रहने से  कोई  नहीं सुनने वाला
बात पड़े कहने की तो फिर कह जाना ।

इज्जत, शोहरत, उल्फत, ताकत, धन-दौलत
सब मीनारें ढहते ढहते ढह जाना। 

मुद्दत बाद मिले यारों से बचपन के 
रात ढल गई कहने लगे सुबह जाना । 

जीवन इक दरिया है, रेत समुन्दर की  
उम्र एक सैलाब सभी कुछ बह जाना ।
(C) पद्म प्रकाश सिंह 15.07.2026







रविवार, 5 जुलाई 2026

गज़ल तेरी आँखों के जादू टोने में

मुद्दत एक लगा दी मेरा होने में
उम्र कट गई बिखरी उम्र सँजोने मे ।  

रिश्तों की कीमत पहचान न पाए तो
क्या रखा है हीरे-चाँदी-सोने में ।

बात दब गई नक्कारों की महफिल में
इससे तो बेहतर था चुप ही होने में।

जो संस्कार झलकते हैं किरदारों में
कई पीढ़ियाँ लगीं सींचने बोने में।

साथ उमर के पथराते ही चले गए
वैसा मज़ा नहीं आता अब रोने में ।

इतने में जाकर बाज़ार उठा लाते
रिश्ते नाते जितना लगे पिरोने में।

एक पुरानी नज़्म पढ़ी तो खो बैठा
फिर उसकी आंखों के जादू टोने में ।

(C) पद्म प्रकाश सिंह -05-07-2026






गुरुवार, 2 जुलाई 2026

धूप

सवेरे ही शाम का मज़मून गढ़ जाती है धूप
एक सफ़हा ज़िन्दगी का रोज़ पढ़ जाती है धूप

लाँघती परती तपाती खेत, घर ,जंगल, शहर
धड़धड़ाती रेल सी आती है बढ़ जाती है धूप

मुंहलगी इतनी कि पल भर साथ रह कर देखिये
पाँव छू, उंगली पकड़ फिर सर पे चढ़ जाती है धूप

किस कदर चालाक है ख़ुर्शीद की बेटी भला
खिज़ां का इल्ज़ाम रुत के सर पे मढ़ जाती है धूप

देख सन्नाटा समंदर पे हुकूमत कर चले
शहर से गुजरी कि बित्ते में सिकुड़ जाती है धूप

पूस में दुल्हन सी शर्माती लजाती है मगर
जेठ में छेड़ो तो इत्ते में बिगड़ जाती है धूप
-पद्म

ख़ुर्शीद की बेटी= सूर्य की बेटी/धूप 

मेरा एकान्त

मेरा एकान्त अक्सर ताने मारता है
कि तुम क्या हो और दिखाते क्या हो… 
क्यों नहीं एक बार झटक देते सिर 
चुका क्यों नहीं देते उधार मान्यताओं का 
दहकती हुई कविता में आग निचोड़ो
नेपथ्य से निकल कर कह डालो अपने संवाद 
मुक्त करो किसी पत्थर में फंसी मूरत 
या तूलिका से गढ़ो कोई आकाश 
जिसमे पंछी सूरज से गलबहियाँ करते हों 
तुन जिस तरह उस लड़की से
विदा ले रहे थे 
मैं समझ गया था 
तुम चप्पू भले चलाओ
घाट से बंधन नहीं खोल सकोगे 
उड़ान कितनी ऊँची कर लो
चरखी से डोर नहीं खोल सकोगे 
उछालो न कोई नाद चौताला 
नोच फेंको मुखौटे  
वरना जब भी मिलोगे  कभी अकेले मे 
छोड़ूँगा नहीं 
और पता ये भी है
गोलचक्कर में भागोगे
तो कहाँ जाओगे 
जब भी खुद से लड़ोगे
मुँह की खाओगे
-पद्म सिंह 15-03-2017

मंगलवार, 26 नवंबर 2024

लेकिन मैने हार न मानी (पद्म सिंह)

संघर्षो की अकथ कहानी।
लेकिन मैंने हार न मानी।।

आशाओं के व्योम अनंतिम
स्वप्नों का ढह जाना दिन दिन
संबंधों  के ताने बाने
नातों  का अपनापा पल छिन
क्रूर थपेड़े संघर्षों के
दुर्दिन की मनमानी,
लेकिन मैंने हार न मानी।।
 
दूर क्षितिज तक अनगिन राहें  
अनबूझी सी  फैली फैली
लक्ष्य कुहासे जैसा धूमिल  
सभी दिशाएँ मैली मैली
कभी समय से टक्कर ली तो  
कभी भाग्य से ठानी,
लेकिन मैंने हार न मानी।।

लिए  तकाज़े नए नए नित
समय खड़ा था सांझ सकारे
दुनिया के, मन के, भावों के
किसके किसके क़र्ज़ उतारे
बिखरा बिखरा बचपन देखा
टूटी हुई जवानी …..,
लेकिन मैंने हार न मानी।।

कुछ भावों के अश्रु निचोड़े
मनुहारों के धागे जोड़े
टूटे छंद बंद रिश्तों  के
जोड़े कुछ तोड़े कुछ छोड़े
निश-दिन के ताने बाने में
बुनती गई कहानी,
लेकिन मैंने हार न मानी।।

यार मिले तो यारी कर ली
दुःख की साझेदारी कर ली
ये न हुआ पर गद्दारों से
मौके पर गद्दारी कर ली
औरों  को माफ़ी दे दी  
पर अपनी गलती मानी,
लेकिन मैंने हार न मानी।।

आँखें नम थी पर मुस्काए
रुंधे गले से गीत सुनाये
शब्दों की माला पहनाई
रस छंदों के दीप जलाए
प्रभु को हँस कर किये समर्पित
नयनों निर्झर पानी,
लेकिन मैंने हार न मानी ।।

रविवार, 5 फ़रवरी 2023

जैसी चादर ले कर आए

जैसी चादर लेकर आए
धर दी मैंने जस की तस ॥

अनगिन सम्बन्धों के चेहरे
ओढ़े स्वांग भरे दिन दिन
काँटे बोए जिसने उसकी
राहों दीप धरे गिन गिन
माना नहीं पराया कुछ भी
जो भी पाया यश अपयश ।।

बहुत पुकारा नील गगन ने
कभी भीड़ ने या निर्जन ने
भरी कुलाँचें भी यौवन ने
उकसाया भी पागल मन ने
दायित्वों की डोर कहीं से
बंधी हुई थी पर कस कस ।।

समझ न आया इस जीवन में
क्या खोया है क्या पाया
किस निमित्त आए थे जग मे
प्रश्न निरुत्तर ही पाया
रोते हुए हृदय को निस दिन
खूब छकाया है हँस हँस ।।

आयु चढ़ गई पौड़ी पौड़ी
साँसें हाँफ हाँफ कर दौड़ी
मन बौराया रहा जोड़ता
धन सुख वैभव कौड़ी कौड़ी
धड़कन एक दिन थक कर बैठी
बोली साथी अब तो बस ॥

जैसी चादर लेकर आए
धर दी मैंने जस की तस ॥

पद्म सिंह (प्रतापगढ़) उत्तर प्रदेश 7011100247

शनिवार, 10 अक्टूबर 2020

कैक्टस गुलाब और गुलाबजामुन

लव गुरु से किसी चेले ने पूछा एक दिन
गुरु नारियों के भेद आज बतलाइए
कैसे किस नज़र से देखे कोई कामिनी को
सार सूत्र सुगम सकल समझाइए

गुरु बोला पहला प्रकार तो है कैक्टस का
दूसरे प्रकार की गुलाब जैसी होती हैं
तीसरा प्रकार नारियों का है गुलाब जामुन
तीन ही तरह से मुझे नज़र आती हैं
चेला बोला गुरु जी समझ नहीं आया कुछ
थोड़ा तो खुलासा कर ज्ञान रस घोलिए
कैक्टस गुलाब औ गुलाब जामुनों से अब
परदा हटाइए रहस्य जरा खोलिए

गुरु बोला कैक्टस है पहला प्रकार जिसे
दूर से ही देखते हैं छू भी नहीं सकते
चखना तो है बड़े ही दूर की कठिन बात
कैक्टस को हम सूंघ भी तो नहीं सकते
बड़े घर की निराली बालकनियों पे सजी
दूर से नाज़ारा लेके लोग ललचाएँगे
छूने का प्रयास मत करना रे प्यारे कभी
वरना तो बेहिसाब काँटे चुभ जाएँगे

दूसरा प्रकार है गुलाब जैसी प्रेयसी का
काँटो की सुरक्षा मे बहुत इतराती है
कभी अठखेलियाँ करे सहेली तितलियाँ
कभी टोली भँवरों की चक्कर लगाती हैं
पर प्रेम या गुलाब का उसूल ऐसा है कि
सूंघ सकते हैं पर चख नहीं सकते
परिणय से ही बनता गुलाब गुलकंद
बिना अपनाए उसे रख नहीं सकते

तीसरा प्रकार नारियों है गुलाब जामुन
गोल मोल लाली सी है अजब निराली सी
नरम नरम रसवंती सी लगे मगर
छूते ही जो फट पड़ती है घरवाली सी
घरवाली नारियों का तीसरा स्वरूप है जी
इत्ता सा कहूँगा उतना समझ जाइए
पत्नी गुलाब जामु न सी है इसीलिए कि
देखिये कि सूँघिए कि चाटिए कि खाइये

-पद्म सिंह 

सोमवार, 7 जनवरी 2013

चला गजोधर कौड़ा बारा(अवधी)


कथरी कमरी फेल होइ गई
अब अइसे न होइ गुजारा
चला गजोधर कौड़ा बारा...
गुरगुर गुरगुर हड्डी कांपय
अंगुरी सुन्न मुन्न होइ जाय
थरथर थरथर सब तन डोले
कान क लवर झन्न होइ जाय
सनामन्न सब ताल इनारा
खेत डगर बगिया चौबारा
बबुरी छांटा छान उचारा ...
चला गजोधर कौड़ा बारा...

बकुली होइ गइ आजी माई
बाबा डोलें लिहे रज़ाई
बचवा दुई दुई सुइटर साँटे
कनटोपे माँ मुनिया काँपे
कौनों जतन काम ना आवे
ई जाड़ा से कौन बचावे
हम गरीब कय एक सहारा
चला गजोधर कौड़ा बारा....

कूकुर पिलई पिलवा कांपय
बरधा पँड़िया गैया कांपय
कौवा सुग्गा बकुली पणकी
गुलकी नेउरा बिलरा कांपय
सीसम सुस्त नीम सुसुवानी
पीपर महुआ पानी पानी
राम एनहुं कय कष्ट नेवरा
चला गजोधर कौड़ा बारा ...
.... पद्म सिंह (अवधी)

बुधवार, 2 जनवरी 2013

न जाने तुमने ऊपर वाले से क्या क्या कहा होगा ...




न जाने क्या हुआ है हादसा गमगीन मंज़र है
शहर मे खौफ़ का पसरा हुआ एक मौन बंजर है
फिजाँ मे घुट रहा ये मोमबत्ती का धुआँ कैसा
बड़ा बेबस बहुत कातर सिसकता कौन अन्दर है

सहम कर छुप गयी है शाम की रौनक घरोंदों मे
चहकती क्यूँ नहीं बुलबुल ये कैसा डर परिंदों मे
कुहासा शाम ढलते ही शहर को घेर लेता है
समय से कुछ अगर पूछो तो नज़रें फेर लेता है
चिराग अपनी ही परछाई से डर कर चौंक जाता है
न जाने जहर से भीगी हवाएँ कौन लाता है

ये सन्नाटा अचानक भभक कर क्यूँ जल उठा ऐसे
ये किसकी सिसकियों ने आग भर दी है मशालों मे
सड़क पर चल रही ये तख्तियाँ किसकी कहानी हैं
पिघलती मोमबत्ती की शिखा किसकी निशानी है\

न जाने ज़ख्म कब तक किसी के चीखेंगे सीने मे
न जाने वक़्त कितना लगेगा बेखौफ जीने मे
न जाने इस भयानक ख्वाब से अब जाग कब होगी
न जाने रात कब बीते न जाने कब सुबह होगी

न जाने दर्द के तूफान को कैसे सहा होगा
न जाने तुमने ऊपर वाले से क्या क्या कहा होगा
बहुत शर्मिंदगी है आज ख़ुद को आदमी कह कर
ज़माना सर झुकाए खड़ा ख़ुद की बेजुबानी पर

मगर जाते हुए भी इक कड़ी तुम जोड़ जाते हो
हजारों दिलों पर अपनी निशानी छोड़ जाते हो
अगर आँखों मे आँसू हैं तो दिल मे आग भी होगी
बहुत उम्मीद है करवट हुई तो जाग भी होगी

.....पद्म सिंह

रविवार, 2 सितंबर 2012

मेरी दुवाओं का अंजाम भी पाए कोई

कभी तो सामने अंजाम भी आए कोई
मेरी दुवाओं का असर भी तो पाए कोई। 

किसी का नाम जुबां पर न सही दिल मे है
मन ही मन से उसे आवाज लगाए कोई ।

कोरे कागज़ के पैरहन कभी रंगीन भी हों
रंग बरसाए कभी झूम के गाए कोई। 

जिसके घर लगता है हर शाम गमों का मेला
जाए भी घर तो सिर्फ नाम को जाए कोई। 

लहू सा उम्र भर जो बहते रहे सीने मे
अब भुलाए तो उन्हें कैसे भुलाए कोई। 

दर्द ऐसा न सहा जाए न छोड़ा जाए
इश्क कैसे तेरा भी साथ निभाए कोई। 

दर्द से जिसने मरासिम बना लिया हो पद्म
काहे पछताए कोई रंज मनाए कोई। 

(C) पद्म प्रकाश सिंह 

पैरहन =पहनावा, लिबास 
मरासिम = रिश्ता 

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

गज़ल

फिर से घनघोर घाटा छाई है अमराई मे
कहाँ हो आन मिलो शाम की तनहाई मे

विरह की आग पे छींटे न दे अरे बादल
कहीं धुआँ न उठे फिर कहीं रुसवाई मे

चाँद बेज़ार भटकता रहा सरे मंज़र
चाँदनी खोई बादलों की तमाशाई मे

रूठने और मनाने को बहुत हैं मौसम
आज तो चूड़ियाँ मचलने दो कलाई मे

पद्म खिलने लगे हैं झील मे कंवल ऐसे
जैसे केसर का रंग घुल गया मलाई मे

-.... पद्म सिंह- 04-07-2012

Posted via email from पद्म सिंह का चिट्ठा - Padm Singh's Blog

बुधवार, 2 मई 2012

क्यों नपुंसक हो गयी हैं आंधियाँ


कहाँ जाने खो गयी हैं आँधियाँ
क्यों नपुंसक हो गयी हैं आंधियाँ

हवाएँ पश्चिम से कुछ ऐसे चलीं
युवा मन मे सो गयी हैं आंधियाँ

मुट्ठियाँ सब बुद्धिजीवी हो गयीं
और तनहा हो गयी हैं आँधियाँ

आज घर मे शान्ति है धोका न खा
अभी कल ही तो गयी हैं आंधियाँ

शक्ति, साहस, और लड़ने की ललक
जाने क्या क्या बो गयी हैं आंधियाँ

"पद्म" सच मे बदलना है दौर तो
जगाओ जो सो गयी हैं आंधियाँ


पद्म सिंह 02/05/20012

शनिवार, 24 मार्च 2012

कैक्टस गुलाब और गुलाब जामुन

Images_1

लव गुरु से किसी चेले ने पूछा एक दिन
गुरु नारियों के भेद आज बतलाइए
कैसे किस नज़र से देखे कोई कामिनी को
सार सूत्र सुगम सकल समझाइए

गुरु बोला पहला प्रकार तो है कैक्टस का
दूसरे प्रकार की गुलाब जैसी होती हैं
तीसरा प्रकार नारियों का है गुलाब जामुन
तीन ही तरह से मुझे नज़र आती हैं
चेला बोला गुरु जी समझ नहीं आया कुछ
थोड़ा तो खुलासा कर ज्ञान रस घोलिए
कैक्टस गुलाब औ गुलाब जामुनों से अब
परदा हटाइए रहस्य जरा खोलिए

गुरु बोला कैक्टस है पहला प्रकार जिसे
दूर से ही देखते हैं छू भी नहीं सकते
चखना तो है बड़े ही दूर की कठिन बात
कैक्टस को हम सूंघ भी तो नहीं सकते
बड़े घर की निराली बालकनियों पे सजी
दूर से नाज़ारा लेके लोग ललचाएँगे
छूने का प्रयास मत करना रे प्यारे कभी
वरना तो बेहिसाब काँटे चुभ जाएँगे

दूसरा प्रकार है गुलाब जैसी प्रेयसी का
काँटो की सुरक्षा मे बहुत इतराती है
कभी अठखेलियाँ करे सहेली तितलियाँ
कभी टोली भँवरों की चक्कर लगाती हैं
पर प्रेम या गुलाब का उसूल ऐसा है कि
सूंघ सकते हैं पर चख नहीं सकते
परिणय से ही बनता गुलाब गुलकंद
बिना अपनाए उसे रख नहीं सकते

तीसरा प्रकार नारियों है गुलाब जामुन
गोल मोल लाली सी है अजब निराली सी
नरम नरम रसवंती सी लगे मगर
छूते ही जो फट पड़ती है घरवाली सी
घरवाली नारियों का तीसरा स्वरूप है जी
इत्ता सा कहूँगा उतना समझ जाइए
पत्नी गुलाब जामु न सी है इसीलिए कि
देखिये कि सूँघिए कि चाटिए कि खाइये


(C) Padm Singh- 9716973262
25/.3/2012 Ghaziabad

Posted via email from पद्म सिंह का चिट्ठा - Padm Singh's Blog

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

भेरी आवाज़ लगाती है


अब जाग उठो अब कमर कसो आहुति की राह बुलाती है
ललकार रही दुनिया हमको भेरी आवाज़ लगाती है

भारत माता के वीर सपूतो धारा की पहचान करो
नावों के बंधन को खोलो पतवार उठा प्रस्थान करो
फिर नए लक्ष्य की चाह विजय की राह तुम्हें दिखलाती है
ललकार रही दुनिया हमको भेरी आवाज़ लगाती है

तंद्रा छोड़ो आँखें खोलो अब नए लक्ष्य संधान करो
तम की कारा को तोड़ फोड़ जगती का नव उत्थान करो
जब अपनी बाहों मे बल हो तो दुनिया पलक बिछाती है
ललकार रही दुनिया हमको भेरी आवाज़ लगाती है

अब प्रण की बारी आई है अब रण की बारी आई है
तन मन को जो दूषित कर दे वो रात दुधारी आई है
भारत माँ अपने बेटों को सत्पथ की राह बुलाती है
ललकार रही दुनिया हमको भेरी आवाज़ लगाती है





बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

बस यही रात सोचने के लिए बाकी है




बस यही रात सोचने के लिए बाकी है
कल सुबह लाने की अपनी ही ज़िम्मेदारी है
एक तरफ सुबह का उजाला है
एक तरफ स्याह अन्धेरे की हवस तारी है
वक्त क्या वेश धर के आएगा
कोई बिरला ही समझ पाएगा
असली चेहरा कहीं छुपा होगा
एक मुखौटा ही मुस्कुराएगा
कुछ समझ पाने की दुश्वारी है
बस यही रात सोचने के लिए बाकी है
कल सुबह लाने की अपनी ही ज़िम्मेदारी है ...

रात सोते में ही इस शहर के लोग,
अपनी आँखों को गंवा बैठे हैं
सुबह जब निकलेगा सूरज तो नहीं जानेंगे
उनके आगे ये अन्धेरा है या वो नींद में हैं
आँख पर पर्दा पड़ा है जो ज़ात मजहब का
या कि केसरिया-सब्ज़ परचम का
उनको मालूम कहाँ अंधे हैं कि परदे हैं.
कौन समझाए भला  कौन उन्हें समझाए,
बस यही रात सोचने के लिए बाकी है
कल सुबह लाने की अपनी ही जिम्मेदारी है!!