रविवार, 27 दिसंबर 2009

दौलत गाड़ी

अब बहुत ज़माना बदल गया
मै चला किया तुम ठहर गयी
तुम प्रेम रह में बैठी थी
मेरी दौलत गाड़ी निकल गयी

तुम मुझे याद कर रोते थे
हा चादर ताने सोते थे
जब फसल पकी तब काट लिया
तुम जिसे दिनों दिन बोते थे
मै सम्हाल सम्हाल कर निकल गया
तुम प्रेम रह में फिसल गयी

हमने दुनिया को खूब छाला
तुम छलती रही ज़माने से
हमने तो अपना स्वार्थ गढ़ा
बस किसी न किसी बहाने से
मै गड्डी गड्डी ले भगा
तेरी चिल्लर पूंजी बिखर गयी

ये दुनिया है इस दुनिया में
दिल मत फेको मत प्यार करो
मत पत्थर के बाज़ारों में
शीशे का कारोबार करो
अब प्रीती प्यार समता ममता की
दुनिया जाने किधर गयी

तुम प्रेम राह में बैठी थी
मेरी दौलग गाड़ी निकल गई
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