गुरुवार, 4 मार्च 2010

पागल पंछी नाचे क्यों (पदम सिंह)

पागल पंछी नाचे क्यों
सोने का पिंजरा ओ पंछी
बना हुआ अस्तित्व तुम्हारा
कनक कटोरी के दानों में
रची बसी जीवन की धारा
पराधीन तन मन आतप है
भूला निज स्वातंत्र्य तुम्हारा
संघर्षों से लड़ मरने से
भली तुम्हें लगती है कारा
अगर नहीं तो छोड़ चहकना
मिट्ठू मिट्ठू गाते क्यों ....
पागल पंछी नाचे क्यों

फूलों की डाली के बदले
झूठे चित्र सजा रखे हैं
छोड़ तरंगित मुक्त पवन को
कृत्रिम वाद्य बजा रखे हैं
भूल गए है पंख तुम्हारे
उड़ना पर्वत घाटी में
ढले हुए हैं भाव तुम्हारे
दुनिया की परिपाटी में
अंतः प्रज्ञा तज कर पगले
मिथ्या पोथी बांचे क्यों
पागल पंछी नाचे क्यों

धीरे धीरे पिंजरे के सुख
ऐसे तुमपर छा जायेंगे
कारा के भयमुक्त सुपल
उन्मुक्त गगन को खा जायेंगे
ऐसे में फिर खुली हवा में
साँसें लेने से डरता है
छोड़ सुरक्षित दीवारों को
उड़ना मुक्त बुरा लगता है
पराधीन होकर भी खुश हो
ऐसे भरे कुलांचे क्यों ......
पागल पंछी नाचे क्यों

अगम अगोचर मन का पिंजरा
अन्तस् की दीवारों सा
ऐसे में कुछ टूट गया है
प्राणों के स्वरधारों सा
जो तुमको अपना लगता है
वो सब केवल सपना है
गहरे पैठ खोज ले प्राणी
जो कुछ तेरा अपना है
मुक्ता मणि छोड़ कर कंकड़
पत्थर भला संवाचे क्यों
पागल पंछी नाचे क्यों

Posted via email from हरफनमौला