गुरुवार, 24 जून 2010

आस्था बनाम बाज़ार

वर्षों से रोज़ मोहन नगर की मंदिर,पीर बाबा की मज़ार और हिंडन नदी के
किनारे साईं उपवन वाले साईं बाबा के मंदिर पार करते हुए बाज़ार, बहुत सी
रिहाईशें और कंक्रीट के फ्लाई ओवर पार करते हुए अपने आफिस पहुँचता हूँ...
और इसी रास्ते आना भी होता है... लेकिन मुझे हर आस्था स्थल एक बाज़ार के
रूप मे ही दीखता है .. ..जिस दिन पीर पर चमकदार गोटे लगी हरी-हरी चादरों
और शीरयों ((प्रसाद की दुकानें, और ट्रैफिक के आगे खड़े हो कर अपनी अपनी
दूकान की ओर आकर्षित करते दूकानदार दीखते हैं तो पता चल जाता है आज
बृहस्पतिवार (पीर का दिन) है, और आगे साईं बाबा के मंदिर के आगे भी शाम
को श्रद्धालुओं की कारों और वाहनों के कारण लगे जाम की स्थिति और फूल
माला के साथ खील बताशे और चीनी के गट्टों से सजी धजी दुकानों से पता चलता
है कि आज साईं बाबा का दिन है ... और नौरात्रों मे तो चुनरी नारियल और फल
वालों की तो पौ बारह रहती ही है .. कई बार रुक कर मैंने इन स्थानों पर हो
रही गतिविधियों को नजदीक से देखने का प्रयास किया. किसी आराध्य के लिए
नियत दिन के बारे मे धार्मिक आस्था की बात तो समझ मे आती है, लेकिन उन
दिनों को भुनाने के लिए जो बाज़ार इन धार्मिक स्थलों के निकट पैदा होते
हैं, उन्हें देखें तो लगता है कि ईश्वर तक पहुचने के लिए आस्था के
अतिरिक्त उनकी अपनी एक अलग और समानांतर व्यवस्था है ... इन्हें देख कर तो
यही लगता है कि अगर ये न होते तो शायद अपने आराध्य तक पहुँच पाना भी शायद
संभव न होता ... क्योंकि जैसे ही कोई श्रद्धालु पहुँचता है उसके वाहन से
लेकर चप्पल जूते, व्यक्तिगत सामान से लेकर बिना लाइन के दर्शन की
व्यवस्था और आराधना सामग्री और नियम तक की व्यवस्था धन के हाथों बिकाऊ
दिखती हैं... जहाँ एक आम आदमी को घंटों अपने आराध्य के लिए लाइन मे लगना
पड़ता है वहीँ किसी पूंजीपति के लिए धर्मस्थल के ठेकेदार अलग से व्यवस्था
करते हैं... और यही नहीं आम आदमियों के लिए तब तक भगवान के द्वार बंद कर
दिए जाते हैं...

अक्सर हमारा हरिद्वार और ऋषिकेश जाना होता है ... ऋषिकेश से
लगभग २३ किलोमीटर ऊपर पहाड़ों पर नीलकंठ महादेव की मंदिर जाना एक सुखद
अनुभव होता है ... यहाँ पर कुछ वर्षों पहले जहाँ चंद दुकानें और एक
धर्मशाला हुआ करती थीं, गाड़ियां मंदिर के पास तक जाती थीं आज लगभग तीन
किलोमीटर पहले ही बैरिकेटिंग लगा कर रोक दी जाती हैं(केवल व्यक्तिगत
वाहन) और वहीं से दुकानों का सिलसिला शुरू हो जाता है ... तीन किलोमीटर
पहले से ही दुकानदार ये कहते हुए मिल जायेंगे कि चप्पल यहीं उतार दें
प्रसाद ले लें... अपने हित साधने के लिए आपको तीन किलोमीटर नंगे पैर
चलाने की व्यवस्था भी धर्म के इसी बाज़ारीकरण की ही देन है... यही नहीं...
नीलकंठ से सात आठ किलोमीटर और ऊपर चढ़ाई चढते हुए माता पार्वती जी और उसके
भी आगे भैरव बाबा की गुफा... और उससे भी आगे दो तीन और गुफाएं (जहाँ पैदल
जाना भी कष्ट साध्य है) तक पेप्सी कोक और अंकल चिप्स की पहुँच अविरल बनी
हुई है ...

चढ़ावे की मात्रा और श्रद्धा के बीच क्या सम्बन्ध है ये तो ईश्वर
जाने, लेकिन एक बात जो स्पष्ट दिखती है कि लालच,,स्वार्थ और अवसरवादिता
ने ईश्वर और आस्था को भी बिकाऊ बना लिया है ... और इसके लोगों की
मानसिकता भी उतनी ही ज़िम्मेदार है... जो प्रसाद या चढ़ावे के अनुपात के
आधार पर अपनी श्रद्धा और आस्था को प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं ...
और इसमें सीधे सादे (तथाकथित कैटल क्लास) लोगों के साथ पढ़े लिखे
बुद्धिजीवी भी शामिल हैं ... इस गोरख धंधे मे (यद्यपि गोरखनाथ जी ऐसे
धंधेबाज़ नहीं थे) आज बिजनेसमैन, मठाधीशों से ले कर सरकार तक शामिल है
...इसी व्यवस्था ने आज नेतागीरी से भी बेहतर विकल्प उपलब्ध कराये हैं...
नेताओं को जहाँ हर पांच साल बाद अपनी औकात दुबारा रिन्यू करनी होती है
वहीँ आस्था के व्यापारियों को ये सुविधा आजीवन मिलती है ... मठों, वक्फ
बोर्डोंमे अरबों, करोड़ो की
संपत्ति और ज़मीनों का या तो बंदरबांट किया जा रहा है या फिर इनका कोई
सामाजिक उत्थान मे प्रयोग नहीं किया जा रहा है ... अंदर की तस्वीर तो
कितनी काली है ये सोच नहीं सकते लेकिन कुछ छोटे-छोटे नमूने ज़रूर हैं जिसे
यहाँऔर
यहाँ देखिये... धर्म और
आस्था के नाम पर करोड़ो रूपये बिना किसी उपयोग के बेकार पड़े हैं ... जिनका
अगर एक हिस्सा भी समाज को वापस कर दिया जाए तो शायद तस्वीर कुछ और हो ...
इस दिशा मे कुछ
सार्थक प्रयास भी हो रहे हैं(नाम लिखना उचित नहीं) जिनको नज़रंदाज़ करना भी
उचित नहीं होगा...

जब तक हमें पांच रूपये के फूल या लाखों रूपये के चढ़ावों से श्रद्धा का
स्तर मापने की विचारधारा रहेगी ये बाज़ार ऐसे ही पनपते रहेंगे ... मुझे
यहाँ मुंशी प्रेम चंद की सोने की बिल्ली याद आती है ... खेद भी होता है
कि हम इक्कीसवीं सदी मे भी दस वर्ष गुज़ार चुके हैं लेकिन रूढ़ियों के फंदे
से अभी तक न निकल पाए
... पश्चिम की नकल भी करते हैं तो अकल से नहीं करते ... स्वार्थ,
बाज़ारवाद और अवसर वादिता ने सांस्कृतिक मूल्यों और आस्था तक को बिकाऊ बना
दिया है ... एक प्रश्न मेरे मन मे उठता है कि "ईश्वर ने अपनी हितसिद्धि
के लिए इंसानों की रचना की है ... या इंसानों ने अपनी हितसिद्धि के लिए
ईश्वर और धर्म की रचना की है "


*जहाँ विवेक रूढ़ियों का दास हो *

*जहाँ आस्था का कारण त्रास हो *

*जहाँ भेड़ व्यवस्था का वास हो *

*वहाँ कैसे प्रगति का उजास हो *

*जहाँ प्रेम का मापन उपहार हो ***

* जहाँ योग्यता का द्योतक प्रचार हो *

* जहाँ मेहनत से बढ़कर आस हो *

* वहाँ कैसे प्रगति का उजास हो *

* *

*जहाँ प्रेम की कीमत पैसा हो *

*जहाँ न्याय मेमने जैसा हो *

*जहाँ लघुतर का उपहास हो *

*वहाँ कैसे प्रगति का उजास हो *

* *

* जहाँ मात्रि शक्ति अपमानित हो *

* जहाँ भ्रष्ट, छली सम्मानित हो *

* जहाँ दया धर्म का ह्रास हो *

* वहाँ कैसे प्रगति का उजास हो *

* *

Posted via email from हरफनमौला