रविवार, 20 जून 2010

इक नज़र का नशा मुकम्मल यूँ





बिन तुम्हारे भी क्या किया जाए
अब मरा जाए या जिया जाए 


लुट गया सब न कुछ रहा बाकी
लुत्फ़-ए-आवारगी लिया जाए 


इस से बेहतर कि शिकायत रोएँ
चाक दामन न क्यों सिया जाए 


इक नज़र का नशा मुकम्मल यूँ
उम्र भर मय न फिर पिया जाए 


इश्क है आज दिमागों का शगल
यूँ न हो ‘दिल’ से हाशिया जाए 


अब तो नेज़ा-ए-इश्क पे सर है
जिस्म अब जाए जाँ कि या जाए 


अजब गज़ल है जिंदगी की भी
रुक्न साधूँ तो काफिया जाए



छुट्टियों नेट से दूर होने के कारण एक लंबे अघोषित अंतराल के बाद ब्लॉग पर अपनी सक्रियता पुनः प्रारम्भ करता हूँ .... छुट्टियों में अपने जन्मस्थान या 'मुलुक' जाने का उत्साह और लोभ हमेशा उधर को खींचता है ... लेकिन अपने जन्मस्थान से काफी दूर होने के कारण वर्ष में एक दो बार ही प्रतापगढ़ जाना हो पाता है ... इधर लखनऊ में भांजेकी सगाई का समाचार मिलते ही हमें लगा कि मौका भी है दस्तूर भी ... इसी बहाने लखनऊ होते हुए प्रतापगढ़ भी कुछ दिन रह लेंगे ... हर बार की तरह इस बार भी सब की प्लानिंग यही थी कि कार से गाज़ियाबाद से लखनऊ और फिर प्रतापगढ़ तक का सफर किया जाय .बच्चों का तर्क है कि कार से लोंग ड्राइव के मज़े भी मिल जायेंगे और इसमें जहाँ भी मन हो रुक कर खाते पीते जाया जा सकता है ... लेकिन मेरे पूर्व के अनुभव बताते हैं कि कार से हर लॉन्ग ड्राइव का मज़ा मुझे अकेले ही लेनापड़ता है .. क्योकि ड्राइव पर हम जब भी निकले होते हैं... पन्द्रह बीस किलोमीटर के बाद कार की आगोश में मै ही मिलता हूँ.. शेष सभी नींद की आगोश में जा चुके होते हैं ... और तब तक सोते रहते हैं जब तक कि गंतव्य न आ जाय ... और तो और लगभग पांच सौ किलोमीटर की लंबी यात्रा के दौरान कई बार तो मुझे भी झपकी आ जाती .. और एक सेकेण्ड को कार दायें या बाएं झूल जाती ... और ऐसा लगभग हर बार होता ... इस लिए इस बार फैसला किया कि हमें कार से न चलकर ट्रेन की सुकूनदायकयात्रा करनी चाहिए ... थोड़ी मुश्किल लेकिन बेहद सुकून के साथ लखनऊ पहुँच गए .. लेकिन गर्मी ने अपने पलक/फलक पांवड़े बिछा रखे थे .. या कहिये मोर्चेबंदी कर रखी थी ...तीन दिन के लखनऊ प्रवास के दौरान मै व्यस्तता के चलते चाह कर भी अपने ब्लोगर बंधु(छोटा भईया) राजीव नंदन द्विवेदी और माननीय सरवत जमाल साहब से मुलाक़ात नहीं कर सका और प्रतापगढ़ चला गया ... प्रतापगढ़ में विद्युत और सड़कों की ऐसी व्यवस्था देख आँखें चुंधिया गयीं... चुन्धियाना वाजिब भी था क्योकि जब दिन में चौबीस घंटे में अट्ठारह घंटे (के बाद) बिजली आती तो आँखें चुंधिया जाती... सौर ऊर्जा से एक छोटा पंखा चलता जो ऊंट के मुहं में जीरे का काम करता .... दिन भर की प्रचंड गर्मी के बाद रात को अगर हवा चल जाती... तब तो रात किसी तरह पार हो जाती लेकिन ऐसा चंद दिनों हुआ ... आठ दस दिन बाद एक दिन की आंधी ने मेरे घर की ओर आने वाले कई विद्युत स्तंभ धराशाई कर के रही सही कसर भी पूरी कर दी ... गर्मी से बचने का एक ही उपाय था घर से घूमने निकल जाओ ... इस लिए अपने छोटे भाई के स्कूल की वैन से रोज़ कहीं न कहीं घूमने का प्लान बनता और निकल जाते घूमने ... इसी बीच एक शाम अविनाश वाचस्पति जी का फोन आया कि ललित शर्मा जी दिल्ली की शोभा बढा रहे हैं और आप कहाँ है ...मैंने शर्मा जी, और राजीव तनेजा जी से अपनी मजबूरी बताई और क्षमा प्रार्थना भी की ...मेरी दूरी और मजबूरी दोनों को ध्यान में रखते हुए मुझे छूट दे दी गयी.... चंद दिनों में वापस गाज़ियाबाद आ गया ....घर से मेरे बड़े भैया अपनी इंडिका से लखनऊ के लिए निकले थे ... कुछ समय बाद फोन आया कि दोपहर की धूप
में ए सी चला कर सफर करते समय उन्हें झपकी आ गयी और चलते हुए ट्रक में पीछे से टक्कर मार दी है ... शुक्र है कि गाड़ी के नुक्सान के अलावा कोई  शारीरिक क्षति नहीं हुई क्योकि ट्रक आगे को जा रहा था .. . अफ़सोस करते हुए हम ट्रेन पर बैठे और वापस आ गए .. अब आप सोचेंगे खा म खा इत्ती कहानी बताई इस से क्या फायदा ... टेम खराब किया ... तो इस कहानी से सीख ये मिलती है कि
१- ब्लॉग से बिना बताए कुछ दिन के लिए खिसक लेने में कोई हर्ज नहीं
२- ज्यादा लंबा सफर अगर कार से करना हो तो प्रोफेशनल ड्राइवर को साथ ले
लें या दो लोग चलाने वाले होँ
३ -सफर रात का अच्छा होता है लेकिन करीब दो बजे से सुबह तीन बजे के बीच
एक बार नींद ज़बरदस्त आती है ... ऐसे में कहीं रुक कर झपकी ले लेना ठीक
होता है
४ -अगर ट्रक में टक्कर मारनी हो तो पीछे से मारें और चलती ट्रक में ही ...
५ -लंबे सफर के लिए कार का चुनाव विशेष परिस्थितियों में ही करें
६ -किसी शहर में जाएँ तो कितनी भी व्यस्तता हो ... ब्लॉगर खोजें और
मेहमान नवाजी का लुत्फ़ ज़रूर उठायें ...(वरना वापस आ कर झूठ मूठ का बहाना बनाना पड़ेगा)
७ -गरमी के मौसम में प्रतापगढ़ जैसे हिल (हिला देने वाले) स्टेशन पर जाने से बचें ..