बुधवार, 25 अगस्त 2010

आज़ाद पुलिस (संघर्ष गाथा-२)

गतांक से आगे –
निर्दोष ब्रह्मपाल लखनऊ की आठ महीने पन्द्रह दिन की जेल काट कर आया तो उसका मन प्रशासन और पुलिस के भ्रष्टाचार के प्रति विरक्ति से भर गया था… जेल मे रह कर उसने जो कुछ भी देखा सुना उसने उसे पुलिस के प्रति मानसिक रूप से विद्रोही बना दिया… लेकिन एक गरीब कर भी क्या सकता था … बूढ़ी माँ की जिद पर उसने ब्रह्मवती से विवाह कर लिया. और आजीविका के लिए मजदूरी करने लगा… मजदूरी कर के कुछ पैसे जुटाए और अपने लिए एक रिक्शा ले लिया और परिवार सहित हापुड कोतवाली मे डेरा डाल दिया … वहाँ भी इसने अपने साथ हुए अत्याचार के लिए न्याय मांगने के लिए जद्दोज़हद करता रहा… लेकिन उसे कभी दुत्कार तो कभी पुलिस हवालात तो कभी लात घूंसे भी खाने पड़े …  न्याय पाने के लिए उसने जिलाधिकारी,पुलिस अधीक्षक से लेकर मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक के सामने अपनी बात रखी लेकिन न् तो मामले की जाँच हुई और न् ही कोई कार्यवाही हुई… दूसरी क्लास तक पढाई करने के बावजूद ब्रह्मपाल मे लेखन की प्रतिभा और समाज के प्रति समर्पण की भावना कूट कूट कर भरी होने के कारण उसने पुलिस की कार्य प्रणाली के सम्बन्ध मे अधिकारियों को हजारों पत्र लिखे…लेकिन कोई हल नहीं निकला … आज वो अपने साथ हुए अन्याय की उम्मीद छोड़ चुका है… आज उसकी एक ही मांग है कि प्रशासन को लिखे गए उसके सारे पत्र वापस कर दिए जाएँ …

लचर पुलिस व्यवस्था के विरूद्ध  संघर्ष -

अपने साथ हुए अत्याचार का कोई न्याय मिलते न देख ब्रह्मपाल ने पुलिस  प्रशासन के प्रति विरोध का अनूठा तरीका अपना लिया … रिक्शा ही उसकी आजीविका का एक मात्र साधन था… उसने एक दिन खुद ही पुलिस की वर्दी पहन ली … और रिक्शे पर आज़ाद पुलिस के बोर्ड लगा लिए… अपने आपको आज़ाद पुलिस के रूप मे इस लिए बदल लिया कि इस पुलिस के पास नेताओं या अधिकारियों का कोई दबाव नहीं है ..आज़ाद पुलिस भ्रष्टाचार के प्रति बिना किसी लाग लपेट के लड़ाई जारी रखेगी … उसने रिक्शा चलाते हुए भी पुलिस का वेश धारण कर लिया और अपने कमाए पैसों से चालान बुक छपवा ली …
अब उसका मिशन है कि रिक्शा चलाते हुए जहाँ भी पुलिस के लोगों को अपनी ड्यूटी से दूर खड़े होते, नशे मे ड्यूटी करते, रिश्वत लेते,या बिना टोपी डंडे के ड्यूटी देते देखता है तुरंत रुक कर पुलिस वाले का चालान काट देता है … और चालान पर नाम सहित कमियों के उल्लेख करने के साथ साथ उस पुलिस वाले से चालान पर हस्ताक्षर भी ले लेता है … हस्ताक्षर न देने पर बवाल खड़ा कर देता है…
जिससे फजीहत के डर से पुलिस वाला हस्ताक्षर कर अपना पिंड छुड़ाता है … और ये चालान एक दो दिन मे एस एस पी आफिस मे बाकायदा कार्यवाही की प्रार्थना के साथ जमा करवा दिया जाता है … ऐसे मे भले पुलिस वाले पर कोई गंभीर कार्यवाही भले न हो लेकिन उसकी फजीहत होना तय  है …  और इसी लिए पुलिस वाले भी उसको देखते ही “राईट-टाइट” हो जाते हैं … जिस पुलिस वाले ने हेलमेट न पहना हो, जिसकी गाड़ी के प्रपत्र पूरे न होँ, या  तिहरी सवारी कर रहे होँ उनका चालान कटना तय है …
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उसका मिशन है कि जिस भ्रष्टाचार और अत्याचार का वो शिकार हुआ है…उसका शिकार कोई और गरीब न हो  इसके लिए उसका यथा-शक्ति संघर्ष लगातार चलता रहता है …
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जहाँ भी उसे लगता है कि व्यवस्था मे कुछ गलत हो रहा है उसके बारे मे प्रशासन को सचेत करने के लिए चिट्ठियाँ लिखना … सरकार की नीतियों के खिलाफ विकास के झूठे साइन बोर्डों पर कालिख पोतना, और अपने तरीके से विरोध दर्ज करवाना उसका रोज़ का काम है … इस सब के कारण अक्सर हवालात की हवा खाता रहता है …. कई बार तो बुरी तरह पीटा भी जाता है…इसी क्रम मे कुछ दिन पहले गाज़ियाबाद कलेक्ट्रेट मे मुख्यमंत्री के विकास सम्बन्धी दावों वाले पोस्टरों पर कालिख पोतने के जुर्म मे कविनगर पुलिस द्वारा अपराध संख्या 371/2010 के अंतर्गत जेल मे निरुद्ध किया गया और उसका रिक्शा भी थाने मे बंद कर दिया गया था जहाँ से अभी कुछ दिन पहले छूट कर आया है….
काफी मशक्कत के बाद रिक्शा भी छूट गया है… और पूर्व की भांति उसका संघर्ष अनवरत चल रहा है … यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ब्रह्मपाल मे न्याय न् मिलने से निराशा अवश्य है लेकिन उसका जूनून आज भी वही है … फर्क सिर्फ इतना है कि पहले उसकी लड़ाई अपने लिए थी और आज वो गरीब जनता के लिए संघर्ष कर रहा है ….

तिरंगा का अपमान -

पिछले काफी समय से “तिरंगा” ब्राण्ड के एक गुटखा कंपनी के विरुद्ध संघर्ष कर रहा है… इसके अनुसार किसी ऐसी चीज़ का नाम तिरंगा होना… या इस पर तिरंगा छापना राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का अपमान है… इस सम्बन्ध मे नगर मजिस्ट्रेट गाज़ियाबाद द्वारा उसके प्रार्थना पत्र के आधार पर पुलिस अधीक्षक गाज़ियाबाद को उक्त के सन्दर्भ मे गुटखा कंपनी के विरुद्ध नियमानुसार कार्यवाही करने के निर्देश दिए गए हैं (कैम्प/एस टी -सी एम/०९ दिनांक २९-०९-२००९) लेकिन न् तो अभी इसकी जाँच पूरी हुई है और न् ही गुटखा कंपनी के विरूद्ध कोई कार्यवाही की गयी है.

और कारवाँ बनता गया

शुरुआत मे जब ब्रह्मपाल इस तरह के विरोध के कार्य करता तो पुलिस के लोग और अधिकारी उसे सरफिरा कह कर या “मानसिक संतुलन ठीक नहीं है” कह कर टाल देते थे… लेकिन धीरे धीरे लोगों और पत्रकारों की उत्सुकता का केन्द्र बनता गया और ब्रह्मपाल के बारे मे ख़बरें छपने लगीं … इससे उसे जानने वालों मे इजाफा हुआ और कुछ समाज सेवी लोग ब्रह्मपाल से मिले और इसके अभियान मे साथ देने की इच्छा प्रकट की …इस तरह ब्रह्मपाल ने स्थानीय लोगों की मदद से “आज़ाद पुलिस वेलफेयर समिति” का गठन किया गया जिसका संस्थापक ब्रह्मपाल को  और अध्यक्ष श्री बी.एस.गौतम को बनाया गया …

आज़ाद पुलिस वेलफेयर समिति -

आज़ाद पुलिस वेलफेयर समिति बन जाने से ब्रह्मपाल को लोगों का समर्थन और अधिक मिलने लगा …उक्त समिति के तत्वाधान मे बहुत से सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किये गए और किये जाते हैं  …इस समिति के माध्यम से दो अनाथ और  गरीब लड़कियों का विवाह करवाया गया … प्रति वर्ष सावन माह मे कांवड के मेले मे इस समिति के माध्यम से कांवडियों के लिए मुफ्त भंडारे का आयोजन किया जाता है …वृक्षारोपण के कार्य करवाए गए जिसका उदघाटन स्वयं सिटी मजिस्ट्रेट ने अपने हाथों से किया …..इसके अतिरिक्त पल्स पोलियो जैसे सरकारी
कार्यक्रमों को भी  सफल बनाने के लिए रैलियाँ निकाली गयीं जिसके पीछे ब्रह्मपाल का जूनून और अथक संघर्ष रहा है … इसके अतिरिक्त गुजरात मे आये भूकम्प पीड़ितों के लिए अथक परिश्रम कर के चंदा इकठ्ठा किया गया और गुजरात भेजा गया…. इसके अतिरिक्त और भी बहुत से कार्य समय समय पर किये जाते रहते हैं… इस सम्बन्ध मे ब्रह्मपाल का कहना है कि जब लोग बुराई का दामन नहीं छोड़ते तो मै अच्छाई का दामन कैसे छोड़ दूँ … लोग कहते हैं क्रम ही पूजा है… लेकिन ब्रह्मपाल का कहना है कर्म तो बुरे भी हो सकते हैं इस लिए “सत्कर्म ही पूजा है” सब से पहले सत्कर्मों की शुरुआत अपने आप से करो … फिर किसी से इसकी अपेक्षा करो… समिति ने पुलिस की छवि सुधारने के लिए राज्य के 70 जिलों के जिलाधिकार्यों को पत्र लिखा है और आवश्यक सलाह दी है … देखना है कि प्रशासन इसे कितनी गंभीरता से लेती है ब्रह्मपाल को सामाजिक कार्यों के लिए कई बार आंबेडकर जन्मोत्सव समिति द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है … आज जब कि वह प्रशासन से नाराज़ है , उसने पिछले पन्द्रह सालों मे प्रशासन को लिखे गए अपने पत्रों को वापस माँगा है …
उल्लेखनीय है कि समाज के बारे मे ऐसी बातें करने वाले ब्रह्मपाल के पास सर छुपाने की भी जगह नहीं है और खुले आसमान के नीचे ही अपना आशियाना बना रखा है… परिवार के नाम पर ब्रह्मपाल की पत्नी और दो बेटे हैं … जिन्हें कभी किसी बरामदे मे तो कभी खुले आसमान के नीचे ले कर रहता है … दिन भर रिक्शा चलाना और इसी कमाई से समाज सेवा करना कितना कष्टसाध्य कार्य है इसे एसी मे बैठे अफसरशाह कैसे और क्यों समझेंगे … लोक सेवक हमारी प्रशासनिक व्यवस्था के आधार स्तंभ हैं … लेकिन भ्रष्टाचार के दलदल मे इस कदर डूबे हैं कि उन्हें स्वार्थ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखाई देता है … अगर कोई अपवाद आता भी है तो धीरे धीरे इसी भ्रष्टाचार रुपी सागर मे समा जाता है … अगर कोई बच भी गया तो स्थानांतरण आदेश की प्रति हमेशा उसका पीछा करती रहती है … ऐसे मे ब्रह्मपाल जैसा जज़्बा एक आम आदमी के लिए सीख से कम नहीं है… उसका कहना है कि कामयाबी अपनी जगह है और प्रयास करना अपनी जगह … जीते जी मेरा प्रयास चलता रहेगा … १९८८ से अकेला प्रशासन से लड़ जाने वाला यह शख्स प्रधानमन्त्री,लखनऊ सचिवालय,जिलाधिकारी, पुलिस अधिकारी से लेकर राष्ट्रपति तक अकेला संघर्ष कर चुका है .. और आज भी अपने जज्बे पर कायम है …
ब्रह्मपाल का वर्मान पता :
ब्रह्मपाल सिंह
लेखक : आज़ाद पुलिस
बरात घर, खुले आसमान के नीचे
नन्द ग्राम गाज़ियाबाद … फोन :9811394513 (PP)
और अन्त मे …… ब्रह्मपाल के दस्तावेज़ और संघर्ष की कहानी की ये बानगी भर है … बहुत संक्षिप्त और मूल मूल बातें लिखते हुए दो पोस्टें भर गयी हैं …पाठकों के समर्थन पर थोड़ा और प्रकाश डालना चाहूँगा ब्रह्मप्रकाश की व्यथा पर … पद्म सिंह