सोमवार, 2 जनवरी 2012

जनमानस स्तब्ध है लोकतन्त्र लाचार

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जनता सड़कों पर खड़ी मांग रही कानून
मनमानी सरकार की बना नहीं मजमून
भय है भ्रष्टाचार पर लग ना जाय नकेल
भ्रष्टाचारी       खेलते     उल्टे    सीधे   खेल
उल्टे   सीधे    खेल   काम जैसे भी बनता
नहीं बने कानून    भाड़ मे जाये जनता
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संसद की सर्वोच्चता सत्ता का यह खेल
कैसी   अंधाधुंध     है    कैसी    रेलमपेल
राजनीति की नसों  मे पसरा भ्रष्टाचार
जनमानस   स्तब्ध है लोकतन्त्र लाचार
लोकतन्त्र  लाचार ठनी नौटंकी हद की
फिर नंगी तस्वीर उभर आई संसद की
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जनता जब से जगी है ऐसी पड़ी नकेल
हुए उजागर बहुत से राजनीति के खेल
कहने को सब चाहते लोकपाल मजबूत
पर सपनों मे डराए  लोकपाल का भूत
लोकपाल का भूत  नहीं कुछ कहते बनता
अन्ना,बाबा, स्वामी पीछे सारी जनता
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मंहगाई सर पे चढ़ी फिर उछला पेट्रोल 
सरकारी वादे सभी  बने ढ़ोल के पोल
भूखा मारे गरीब और सड़ता रहे अनाज
देश नोच कर खा रहे  सत्ताधारी बाज़
सत्ताधारी बाज़    कयामत    जैसे  आई
जीना दूभर हुआ चढ़ी सर पे मंहगाई
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यह रचना  मेरे अन्य ब्लॉग  पद्मावलि पर भी प्रकाशित है... क्षमा  करें !

3 टिप्‍पणियां:

  1. JANMANAS CHAHE STABDH HO,CHAHE LOKTANTRA LACHAR
    MAHANGAIE YU HI BADHEGI ,KARO TUM CHHAHE HAHAKAR JEB BHARE BIN KAISE KARENGE HUM VOTON KA VYAPAR
    AB KUCH BHI KARLO TUM,SAHNA HOGA YEH BHRASTACHAR

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  2. Aapne aise sateek dhang se aisa sajeev chitran kar diya ki kuchh kahte(prashansha ko shabd dhoondhte) nahi ban raha...

    Bahut hee sateek aur saarthak rachna...
    Sadhuwaad !!!

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  3. शशक्त ... प्रभावी हैं सभी व्यंग ...

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