शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

अ र र र र झम !.... लो जी आ गया वो....

अ र र र र झम !
.... लो जी आ गया वो .... अरे वो ही .... जिसने खिला दिए हैं चमन में नए
नए फूल... और खींच मारे हैं दिल के बीचो बीच विरह के शूल .... भाई ये वही
है जो सब ऋतुओं के राजा बसंत के सर चढ कर बोलता हैं और ले जाता है एक नई
दुनिया में .... मस्ती और शरारत से भरी दुनिया से रंग और गुलाल से सजी
दुनिया तक ... मोहक तरुणाई से मादक अंगडाई तक...और इसका आना जैसे हर सोच
का जवां हो जाना ... आते ही इसके कुछ ऐसा होता हैं जैसे प्रेम की चाशनी
में उमंग की खुशबू मिला दी हो ... जैसे सजग बसन्त को भंग पीला दी हो ..
ये है मस्त मस्त फाग का मौसम ......और इसके आने का पता देती हैं आज की ये
पंक्तियाँ -

मन में उड़े पतंग तो समझो कि फाग है
हुलसाए अंग अंग तो समझो कि फाग है
दुनिया लगे रंगीन, दिन गुलाल सा उडें
बिन पिए चढ़े भंग तो समझो कि फाग है
**

फागुन के आने के आभास मात्र से ही पुराने पत्ते झरते लगते हैं और नए
पत्ते नव सृजन का सन्देश देते हैं ...मौसम गुलाबी होने लगता हैं ......
सर्दी की बोझिल हवाएं नव तरुणी सी मदमस्त हो कुलांचें भरने लगती हैं
...नए पत्ते अपनी कोमल और बालसुलभ अटखेलियों के साथ कसमसाते हैं और टेसू,
ढाक के फूल मौका पा कर जैसे वन में आग सी लगा देते हैं .... धरती अपने नए
कलेवर में सजने संवरने लगती है.. और सुन्दर कलेवर में सुहागिन सी दीखती
है .......

पात झरे ज्यूँ चांदनी, दिन सुलगाये आग
टेसू फूले बन जरे जैसे लग गयी आग
नवल पुष्प नव पांखुरी नूतन मधुप पराग
धरती ने धारण किये सुभग सुहास सुहाग
**

ये मौसम अपने मदमस्त चरित्र के लिए जाना जाता है पर जो अपने जोड़े से दूर
हैं उनके लिए ये मौसम विछोह की कसक से भरा और विरह की पीड़ा से अधीर करने
वाला है ...इसकी मस्ती ही प्रियतम की याद को झंझावत की तरह उमड़ घुमड़ कर
ऐसा लाती है कि कोई रसिक विकल हुए बिना न रहे

मन बौराया सा रहे, मस्ती सकल सरीर
कसक जगाए डोलती पुरवा मलय अधीर
टिहुक टिटिहरी मारती विरह बान गंभीर
बेकल सा तन डोलता,चित्त धरे नहीं धीर
**
और तो और काम देव ने बसंत में जो कुछ तैयारी की है उसकी परिणति का समय भी
आ पहुंचा है .. चारों और जैसे सम्मोहन सा खिंच रहा हैं ..... काम अपनी
कुटिलता से बाज़ नहीं आता और तन मन कुमार्ग पर भी ले चले तो अचरज नहीं
....और फागुन की यही मस्ती उम्र के पड़ाव भूल अपनी तरुणाई में ही विचरता
है .......

मोहनि मन मोहित करे मदन मंद मुसुकाय
काम कुटिल कल ना रहे करत कुमारग काय
ऋतु बसंत के रथ चढा ऐसा आया फाग
ले अंगडाई जागते मन के सोये राग

....... आज इतना ही ...अभी तो प्रारंभ हुआ है ....
रंग चढेगा धीरे धीरे ..
चटकेगी नित नयी कली रे
मनवा मत हो बहुत अधीरे .....
श्याम मिलेंगे यमुना तीरे
...........

Posted via email from हरफनमौला