सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

दिलकश नज़ारे गाँव में

2 comments:

Ismat Zaidi said...

mubarak ho, bahut umda ghazal hai sachchai alfaz ka jama pahan kar hamare saamne hai.

October 25, 2009 12:03 AM

इस्मत ज़ैदी said...

shahid sahab ji chahta hai is ghazal par kuchh aur likhoon
शहर की रंगीनियों से सादगी अच्छी लगी
हमने ओहदों के लबादे जब उतारे गाँव में

साजिश-ऐ-तकदीर ने दोनों को तनहा कर दिया
बेसहारा मै यहाँ, मेरे सहारे गाँव में

लौटने की कोशिशें करता रहा ''शाहिद'' मगर
रह गए अपने सभी बांहें पसारे गाँव में

itne khoobsoorat ashaar ,kya bat hai sbhan allah ,aankhen bhar aayeen

January 21, 2010 8:57 AM

वाह........ आज दिल को सुकून आया मुझे ...... अब लगा कि ब्लॉग जगत आबाद है ..... ऐसे ऐसे हीरे हैं इसमें ... इसका तो अंदाजा ही न था .. शहीद साहब की गज़ल और ... जैदी साहब आपके भी अलफ़ाज़ और एहसास को सलाम ...

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