रविवार, 10 अप्रैल 2011

नकटों का गाँव … पद्म सिंह

एक कहानी है….

nose 2एक गाँव में किसी व्यक्ति की नाक कट गयी थी…. पूरे गाँव के लोग उसे नकटा कह-कह कर दिन भर चिढ़ाया करते….सब नाक वालों को देख कर "’इनफीरियारिटी कोम्प्लेक्स' से ग्रसित हो गया था…  नकटे को बहुत बुरा लगता और अपने आप को  अकेला महसूस करता… एक दिन सुबह उठते  ही वह नाचने लगा, गाने लगा…  गलियों में हँसता हुआ मुस्कुराता हुआ और आत्म विभोर हो कर घूमने लगा…. पूरा गाँव सकते में था… आखिर इसे  हुआ क्या?  

किसी ने साहस कर के पूछा भाई क्या बात है आज तो बदले बदले से नज़र आ रहे हो… आनंद की सीमा नहीं है तुम्हारे, कोई खजाना हाथ लगा है? नकटा फिर भी नाचता गाता रहा कुछ नहीं बोला… पूरा गाँव इकठ्ठा हो गया… बहुत दबाव पड़ा तो इस आनंद का राज़ बताने को राज़ी हुआ…बोला मुझे रात ईश्वर के साक्षात दर्शन हुए हैं…अब भी मुझे स्वार्गिक अनुभव हो रहे हैं… लेकिन कैसे हुआ ये किसी को नहीं बताऊंगा… यह कह कर घर चला गया

चर्चा पूरे गाँव में फ़ैल गयी. लोग अकेले में मिल कर ईश्वर प्राप्ति का राज़ जानने की कोशिश में लग गए… गाँव का मुखिया भी अकेले में मिला और जैसे तैसे राज़ बताने पर राज़ी कर लिया… उसने बताया कि मेरी नाक कटने से ही ईश्वर के दर्शन हुए हैं… ईश्वर ने कहा है कि मेरे दर्शन वही पायेगा जिसकी नाक कटी हो…

गाँव का मुखिया लालच में आ गया और उसने भी नाक कटवा ली… नाक कटने पर कुछ भी नहीं हुआ तो उसने फिर पूछा… मुझे तो दर्शन हुए नहीं…. अब नकटा मुस्कराया… मुखिया जी… दर्शन हों या न हों…तुम भी यही कहना शुरू कर दो… बरना सारा गाँव तुम्हें नकटा और बेवक़ूफ़ कहेगा… मुखिया उसकी चाल में फँस चुका था…  लेकिन नाक कट चुकी थी… सो … उसने भी नाचना और यही कहना शुरू कर दिया…

इस बात को कहने वाले अब दो लोग थे…. जैसी कि प्रथा है… बहुमत सत्य के रूप में देखा जाता है… बात की विश्वसनीयता और बढ़ गयी.

धीरे धीरे दो चार लोग और भी इनके चक्कर में पड़े और नाक कटवा ली… धीरे धीरे बात की विश्वसनीयता बढती गयी और पूरा गाँव नकटा हो गया… सब बराबर… समाजवाद आ गया हो जैसे… लेकिन एक आदमी उनमे सब से होशियार था जिसे इस बात पर विश्वास नहीं होता था… वो किसी भी तरह से नाक कटवाने को तैयार नहीं हो रहा था… हर तरफ से प्रलोभन और दबाव बढ़ने लगा लेकिन वो टस से मस नहीं हुआ….

आखिर नकटों की मीटिंग हुई… और अगले दिन से पूरा गाँव उसे “नक्कू" कह कर चिढ़ाने लगा…  ओय नक्कू … वो देखो नक्कू आ रहा है… उसको बिरादरी से अलग कर दिया गया… हेय दृष्टि से देखा जाने लगा…

अंत में नक्कू परेशान हो गया… परेशान हो कर… उसने भी सब कुछ जानते हुए… न चाहते हुए भी नाक कटवा कर नकटों की ज़मात में शामिल हो गया…

इधर एक अनुभव हुआ कि आज देश प्रेम, ईमानदारी, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर बात किया जाए तो लोग अजीब नज़रों से देखते हैं… इसी क्रम में मुझे भी कईयों ने व्यंग्य में देशभक्त जी जैसे विशेषणों से भी नवाजा है… कई बार लगता है कि इस विषय पर बात  कर के मै कुछ गलत कर रहा हूँ…कुछ नक्कू जैसा भी  महसूस करता हूँ, कि क्यों न नाक कटवा कर नकटों में शामिल हो जाऊं …आज के दौर में ईमानदारी, देशभक्ति, और नैतिकता जैसी बात करने वाले लोगों को नक्कू की तरह देखा जाना अप्रत्याशित नहीं है … और यह कटु सत्य है कि ईमानदारी आज अल्पमत में है और लोग  नाक कटवा कर नकटों में शामिल होने को मजबूर है…. ऐसा नहीं है कि लोग व्यवस्था में सुधार नहीं चाहते… उन्हें प्रकाश की कोई किरण भी तो नहीं नज़र आ रही थी…

71021_165845033445190_6210520_nपिछले कुछ दिनों में भ्रष्टाचार के विरूद्ध अन्ना हजारे के साथ जंतर मंतर पर तीन दिन बिता कर जैसा महसूस किया वैसा तो वहाँ रह कर ही महसूस किया जा सकता है…. बाबा रामदेव जी और अन्ना तो एक जरिया हैं … प्रबुद्ध और पढ़े लिखे लोगों ने जिस तरह से भ्रष्टाचार और व्यवस्था के खिलाफ़ एक जुटता और आक्रोश दिखाया है उससे कम से कम समस्या का त्वरित हल न सही उम्मीदों को बल ज़रूर मिलेगा… कम से कम उन्हें एक दिशा और रौशनी की किरण ज़रूर मिलेगी जो नाक कटवा कर नकटों में शामिल होने को मजबूर हैं…