शनिवार, 5 मार्च 2011

एक था राम सरन

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सुबह देखने वालों की भीड़ की आँखों मे सहानुभूति, तिरस्कार, और जुगुप्सा जैसे कई भाव मिलजुल कर एक साथ थे... वो घण्टा लिए लेटा था ...

छैल बिहारी पाँड़े रियासत के दौर मे खूंखार दारोगा हुआ करते थे ...  कहते हैं उनके जैसा लठैत इलाके मे नहीं था। सिर पर गमछा लपेट कर जिस समय लाठी ले कर दौड़ पड़ते पचासों की भीड़ काई की तरह छितरा जाती...चारों तरफ से चलते ईंटे-अद्धे अपनी लाठी पर रोक लेना हुनर मे शामिल था... इलाके मे छैल बिहारी से भिड़ने की हिम्मत किसी मे नहीं थी... अपनी लाठी के दम पर किसी का खेत कटवा लेना... जमीन हड़प लेना... और फर्जी मुकदमे मे फंसा कर बर्बाद कर देना बाएँ हाथ का खेल था...

कहते हैं एक बार पूरे गाँव को फ़ौजदारी मे फंसा कर साल भर के लिए जेल भेज दिया था। बेईमानी, दबंगई और अपनी लट्ठ के बल पर बहुत कुछ बनाया कमाया... समय हर मर्ज की दवा होती है। एक समय बीमारी ने ऐसा जकड़ा कि फिर उठना नहीं हुआ... खेत, खलिहान, और ऊल जलूल कमाए हुए रूपये पैसे घर द्वार सब छोड़ कर सिधार गए।

इन्हीं छैल बिहारी पाँड़े के दो लड़के अवधेश और राम सरन उस समय चढ़ती उम्र के जवान थे... उन्हें भी उद्दंडता अपने पिता से विरासत मे मिली थी... आए दिन गाँव वालों से, अड़ोसी पड़ोसी  से झगड़े होते थे, अब परिवार और पट्टीदारों से  से झगड़े होने लगे... जरा जरा सी बात पर  सुबह शाम फरसे, लाठियां और बल्लम(भाले) निकलने लगी।

राम सरन का विवाह नहीं हुआ... छोटे भाई के बच्चों को अपने साथ ले कर घूमता फिरता... दोनों के पास खेती बारी के अलावा कमाई का कोई साधन नहीं था ... लेकिन शानो शौकत से रहने की आदत ने धीरे धीरे इस हद तक ला दिया कि  खेत बेच कर खर्च चलाने लगे... लेकिन दिखावा वही रहा... राम सरन ने पुलिस की दलाली शुरू कर दी... दो पक्षों मे लड़ाई करवाना और फिर FIR और समझौते के नाम पर दोनों से धन उगाही करना उसका पेशा बन गया... कोई उसके कहे के अनुसार न चलता तो उसको अजीबोगरीब सज़ा देता ..... पहले तो उसके घर चोरी करवा देता... या फिर कोई नुकसान करवा देता... खड़ी फसल मे बेर की कंटीली  झाड़ियाँ लुंगी से बाँध कर रात भर घसीटता और खड़ी फसल को चौपट कर देता... किसी के खेत की आलू रातों-रात खोद लेना... आम की बाग से बोरियों आम तोड़ लेना उसका रोज़ का काम बन गया...

खानाबदोश की तरह घूमते रहने वाले राम सरन का चेहरा और पहनावा भी उसकी सोच और आदतों की तरह विद्रूप होता गया .... कुर्ता और लुंगी पहन कर शकुनि जैसी चाल के साथ एक पसली के राम सरन की  एक आँख छोटी और गड्ढे के अंदर कोटर मे  घुस गयी लगती  थी,.... एक आँख की भवें ऊंची नीची होती तो राम सरन को और भी रहस्यमय लगता था ...

जीवट इतना,कि रात रात भर वेताल की तरह गाँव गाँव घूमता... सर्दियों की कई कई रातें   किसी के गन्ने के खेत के बीचों बीच जगह बना कर गन्ना चूसते हुए बिता देता... खेतों मे खड़ी फसल की बालियाँ रात मे लुंगी मे झाड़ लेना मामूली बात थी...

गावों मे आज भी ब्राह्मण के घर पैदा हो जाना भी उसकी योग्यता का प्रमाण-पत्र होता है।.... चाल चलन कैसा भी हो लोग पैलगी करना नहीं भूलते... और फिर एक कहावत है कि "नंगों से खुदा भी हारा है" इस कारण लोग डर से राम सरन से प्रत्यक्ष रूप से खुल कर कुछ कहते हुए डरते थे...

अपनी इन्हीं हरकतों से धीरे धीरे ज़्यादातर खेत बिक गए या गिरवी चढ़ गए.... चोरी चकारी करने और दूसरों को परेशान करने की आदत नहीं गयी... पता नहीं किस सोच के कारण अपने बचे खुचे खेतों के कागजात के बदले नया ट्रैक्टर भी खरीदा गया लेकिन किश्तें न जाने के कारण खेत और ट्रैक्टर दोनों चले गए...

इलाके के लोग भी तंग आ चुके थे... आस पास के कई गावों मे उसका आतंक पसरा हुआ था...बिना कारण भी किसी का नुकसान कर देना उसका शगल था ... कहते हैं सबको अपने किए की सज़ा यहीं मिलती है ...  मई जून  की कोई रात थी वो ... यादवों के गाँव मे पीपल के पेड़ पर बीस किलो का पीतल का घंटा लटका हुआ था... लगभग एक से डेढ़ के बीच का समय रहा होगा... लोग एक नींद पूरी कर चुके होंगे... एक साया पीपल के थान से होकर  अंधेरे की आड़ लेते हुए पेड़ पर चढ़ा... पीतल का घंटा भारी होने के बावजूद उसे खोला और पेड़ से नीचे उतार लिया ...

... लुंगी मे बांधते हुए अचानक घण्टा टन्न की आवाज़ के साथ बज गया... किसी को शक हो गया और एक आवाज़ पर गाँव मे जाग हो गयी और लोगों ने टार्च और लाठीयों के साथ इलाका घेरना शुरू कर दिया... इसके बावजूद भी चोरी करने वाले ने घण्टा नहीं छोड़ा और दोनों पैर के बीच मे घण्टा दबाकर एक चौड़ी नाली मे लेट गया .... मगर हर अति का एक अंत होता है... उस दिन काल ने अपना जाल बिछा रखा था....

सुबह पता चला राम सरन की लाश पैरों मे घण्टा दबाये नाली मे लेटी थी...