बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

ग़ज़ल

दोस्त बन बन के सताने वाले
अब तरसते है मेरे बाद ज़माने वाले
आज वो हाल पूछ बैठे मेरा
आज फिर ज़ख्म उभर आए पुराने वाले
आज फिर चैन में खलल सा है
सपनों में आने लगे चैन चुराने वाले
तेरी दस्तक का मुझे इंतजार आज भी है
बेकली में मुझे ऐ छोड़ के जाने वाले
वो जो डूबा तो मिले मोती उसे
कौडियाँ बीनते ही रहे किनारे वाले
इश्क में भंवर है तूफ़ान भी है
ज़रा संभल जा इसे तैर के जाने वाले
..................०७-०४-०९