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तुम मुझे टीप देना सनम
टीपने तुमको आयेंगे हम
ऐसे याराना चलता रहे
ब्लॉग की राह के हम कदम
एग्रीगेटर सजा कर थके
मेल सबको लगा कर पके
कोई झाँका नहीं इस तरफ
राह कोई कहाँ तक तके
हम भी चर्चा बना लें कोई
सारी मुश्किल समझ लो खतम
तुम मुझे टीप देना सनम
टीपने तुमको आयेंगे हम
कोई एसो सियेशन गढो
कभी टंकी पे जाओ चढ़ो
अपनी गलती को मानो नहीं
दोष औरों के माथे मढ़ो
माडरेशन लगा कर रखो
हम भी देखेंगे किसमे है दम
तुम मुझे टीप देना सनम
टीपने तुमको आयेंगे हम
कभी गूगल से फोटो चुरा
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कोई कंटेंट मारो खरा
हेरा फेरी करो, चेप दो
कोई माने तो माने बुरा
ब्लॉग अपना है जो मन करो
कोई दिल में न रखना भरम
तुम मुझे टीप देना सनम
टीपने तुमको आयेंगे हम
(जस्ट खुराफात …:) )
………आपका पद्म



दिल्ली पुलिस मे इंस्पेक्टर और उदीयमान कवि श्री राजेन्द्र कलकल जी ने हिंदी और हरियाणवी मे अपनी हास्य रचनाओं से माहौल को हल्का फुल्का कर दिया..


मैंने अपने मित्र से कहा तुम इस जलते दीप को लेकर कहाँ जा रहे हो तुम्हारा घर तो प्रकाश से भरा है….. मेरे अँधेरे घर को इसका प्रकाश चाहिए…… इसे मुझे दे दो … किन्तु अज्ञान के आवरण मे लिपटे मित्र ने कहा….. मै अपने अंतस के अन्धकार को मिटाने के लिए मै इसे गंगा माँ को अर्पित करना चाहता हूँ ……और उसने अपना दीप गंगा की लहरों मे प्रवाहित कर दिया….. देखते देखते एक नहीं दो नहीं असंख्य दीप निष्प्रयोजन ही गंगा की लहरों मे समाहित हो गए और मेरी कुटिया मे अँधेरा है



इसी क्रम में मुझे छह सात वर्ष पुरानी एक सत्य घटना याद आती है… जब मेरा साक्षात्कार एक भटकती आत्मा से हुआ… मुझे गाज़ियाबाद आये हुए कुछ ही वर्ष हुए थे … बिजली पानी की चौबीस घंटे सुविधा को देखते हुए मैंने किराए पर न रह कर विभागीय आवास में ही रहना ठीक समझा… मेरा उक्त आवास अन्य आवासों से हट कर है दोनों ओर घास के लान और किचेन गार्डन के लिए जगह होने के कारण अलग थलग सा लगता है… उस दिन पहली बार मै अपना कम्प्युटर(डेल का पेंटियम-3) खरीद कर लाया था… नए कम्प्युटर के प्रति उत्सुकतावश मै बाहर वाले कमरे में खिड़की के पास कम्प्युटर ले कर बैठा था… घर में सब सो गए थे … कम्प्युटर पर आँखें गड़ाए हुए मुझे रात काफी देर हो गयी थी… बाहर की लाईट खराब होने के कारण धुप अँधेरा पसरा हुआ था … मै खिड़की के एकदम पास बैठा था … अचानक मुझे ऐसा लगा जैसे कोई मेरी खिड़की पास से दबे पाँव गुज़रा हो…. पहले तो मैंने नज़रंदाज़ कर दिया कि मेरा वहम हो सकता है …. आधे मिनट में ही खिड़की की मच्छर जाली से बाहर किसी की साँसों की आवाज़ सुनाई दी …..
और फिर से कोई दबे पाँव खिड़की को पार कर गया … अंदर लाईट जल रही थी … इस लिए बाहर के अँधेरे में कुछ भी नहीं दिख रहा था …. मैंने कम्प्युटर से नज़र हटाये बिना उस आहट के प्रति सजग हो गया था….आहट इतनी स्पष्ट थी कि एक बार तो मेरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गयी … मैंने उसी समय उस आहट से निपटने का मन बना लिया …. धीरे से उठा और अंदर की लाईट बंद कर ली … जिससे मेरी किसी हरकत का पता बाहर वाले को न लगे …. अंदर अँधेरा होने पर मै उठा और दरवाजे तक दबे पाँव गया… चटकनी हौले से खोला और अचानक दरवाजा खोल कर बाहर आ गया … बाहर धुप अँधेरा फैला था … ऊपर से कम्प्युटर स्क्रीन पर घंटों आँखें गड़ाए होने के कारण आँखों के आगे चमकीला धब्बा सा बन गया था,…. मै कुछ भी नहीं देख पा रहा था … चूंकि आहट आवास के बगल वाली तरफ की खिड़की के पास थी इस लिए मै अँधेरे में अपनी आँखे फाड़े बगल के कनेर के पेड़ के झुरमुट हटाते हुए गौर से देखने का प्रयास किया…. आप यकीन मानिए जो मंज़र था उसे देख कर कोई भी कमज़ोर दिल का इंसान गश खा कर गिर सकता था … मुझे हल्का हल्का दिखने लगा था … मैंने देखा कि बड़े बड़े खुले बाल कन्धों पर बिखराये … कुर्ते पायजामे में एक साया दीवार से सटा…. दीवार के मोड़ के कोने में चुपचाप दोनों हाथ ऊपर उठाये खड़ा था … इतना देखते ही एक बार तो जैसे बिजली सी कौंध गयी पूरे शरीर में … सेकेण्ड के पौने हिस्से में एक एक रोम सिहर गया … पर अगले ही पल मैंने अपने आपको सम्हाला और उसके थोड़ा और नज़दीक गया … और डाट कर पूछा … “कौन है वहाँ?” ………साया अब भी बिना हिले डुले चुपचाप बुत की तरह खड़ा था… मै एक दो कदम और आगे बढाए और फिर चीख पर पूछा “कौन है उधर?”….. अब मेरी और उसकी दूरी पांच फिट की रही होगी…. अचानक साया उछला और मेरे एकदम पास आ कूदा और मेरी आँखों में घूरते हुए स्त्री आवाज़ में बोला… “मै भटकती आत्मा हूँ” … अब आप अंदाज़ा लगाइए कि ऐसी स्थिति में एक इंसान की क्या हालत हो सकती है…. मै भी उसी फुर्ती से एक कदम पीछे हटते हुए अपने आप को हर परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार कर चुका था … मैंने फिर पूछा “यहाँ क्यों आई हो” … आत्मा मुझे पहले की तरह घूरती रही … फिर रहस्यमय आवाज़ में बोली …. मेरे गुरु का आदेश था … मै इधर से गुजर रही थी … पेड़ की पत्तियां छूते ही मुझे पता चल गया कि कमरे में कुछ हो रहा है …. उसके इतना बोलने तक मै अपने आपको सम्हाल चुका था …. और फिर आगे बढ़ा और आत्मा की कलाई पर अपने पंजे जकड़ दिए …. लगभग घसीटते हुए उसे झाडियों में से आवास के सामने ले आया जहाँ इतनी रौशनी थी कि गौर से कुछ देखा जा सके … देखा तो पाया कि इस भटकती आत्मा की उम्र लगभग पच्चीस से तीस साल की रही होगी …. सफ़ेद कुरता पायजामा, गंदे और बिखरे हुए बाल के साथ साथ खड़ी और अच्छी हिंदी में वार्तालाप करती हुई आत्मा के बारे में तय हो चुका था कि ये फिलहाल इंसानी शरीर ही है … उसके बाद मै जो कुछ पूछता उसका ऊल जलूल उत्तर देती … मुझे जाने क्यों झुंझलाहट में क्रोध आया और मैंने झन्नाटेदार एक तमाचा उसके गाल पर रसीद कर दिया (जिन्होंने खाया है वो कहते हैं मेरा एक तमाचा कई मिनट के लिए सुन्न कर देने के लिए काफी होता है) … तमाचा खा कर काफी देर तो उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया… और फिर जब बोली तो कुछ इस दुनिया जैसे अंदाज़ में …. मैंने अब भी उसकी कलाई जोर से पकड़ रखी थी …. कुछ सोच कर उसे रौशनी में देखने के लिए उसे लगभग दो सौ फिट दूर गैया वाली आंटी के घर के सामने तक ले गया… आंटी बाहर ही सो रही थीं … मेरे बुलाने पर बाहर की लाईट जलाई तो वो भी अचंभित हो गयीं कि रात दो बजे मेरे साथ ये कौन थी … फिर पूछताछ का दौर चला …. आत्मा जी अच्छी खासी हिंदी बोल रही थी … बीच बीच में अंग्रेजी के शब्द… कम्प्युटर वगैरह की भी जानकारी थी उसे … नाम भी कुछ अच्छा सा बताया था उसने… इंदौर की रहने वाली थी …. उसने बात चीत के दौरान कई बार आंटी से पूछा कि बताओ इसने मुझे मारा क्यों ? मैंने इसे छेड़ा था?, या इसे आँख मारी थी, मै तो कम्प्युटर देख रही थी…देखो मेरी पेशाब निकल गयी है …
हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है
जैसे कोई सपना थक कर टूटा लगता है
महल चुने, दीवारें तानी चुन चुन जोड़ा दाना पानी
लाखों रिश्तों में अपनी सूरत ही लगती है अनजानी
कर्तव्यों की कारा में मन का पंछी बिन पंख हो गया
अनजाने अनचाहे पथ पर चलते जाना भी बेमानी
मन उपवन का नकली हर गुल बूटा लगता है
हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है
सोने की दीवारें भी बंदी की पीर न हर पाती हैं
यादों की दस्तक पर, अनजाने आँखें भर आती है
पीछे मुड़ कर देखो तो कल अभी अभी सा लगता है
आगे जीवन के दीपक की बाती चुकती जाती है
आईने का मंजर लूटा लूटा लगता है
हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है
जीने का पाथेय चुकाना होता है हर धड़कन को
साँसे देकर पल पल पाना होता है जीवन धन को
जीना भी व्यापार हुआ पाना है तो देना भी है
जैसे तैसे समझाना पड़ जाता है पागल मन को
ऊपर वाले का भी खेल अनूठा लगता है
हंसना मुस्काना खुश रहना झूठा लगता है